धर्म मार्गदर्शन

45. रिश्ते

45. रिश्ते

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
  2. ईश्वर की सभी ओर समदृष्टि है. वह सबका खयाल रखता है.
  3. जीवन में मनुष्य को अनेक रिश्ते मिलते है. जैसे – माता, पिता, चाचा, चाची, मामा, मामी, फूफा, बुआ, बेटा, बेटी, भतीजा, भतीजी, भांजा, भांजी ई.
  4. मनुष्य जैसे ही जन्म लेता है, उसका पहला रिश्ता माँ से बनता है. जब माँ है तो पिता भी है. और फिर इनके रिश्तेदार भी है. अर्थात जैसे ही मनुष्य जन्म लेता है उसके साथ रिश्ते बनते है.
  5. जिस घर में संतान का जन्म होता है, उसके साथ नए रिश्ते भी जन्म लेते है.
  6. रिश्तों से ही मनुष्य को अकेलापन महसूस नहीं होता. जिनको रिश्ते, रिश्तेदार है वे एक समूह का आनंद लेते है, जिन्हें नहीं है उन्हें इसकी कमी महसूस होती है.
  7. जीवन में कई बार रिश्ते बनते है, बिगड़ते है. जुड़ते है, टूटते है. फिर भी मनुष्य नए नए रिश्ते बनाते रहता है. बिना रिश्तों से उसका जीवन नीरस है.
  8. रिश्ते ओर रिश्तेदारों को हमेशा जोडना पड़ता है, उन्हें टिकाये रखना पड़ता है. इसलिए पूर्वजो ने एकदूसरे को उपहार देने की प्रथा शुरू की है.
  9. मनुष्य अपने रिश्ते ओर रिश्तेदारों को नजरंदाज न करे,  उनका उचित आदर करें. हो सके तो अपनी हैसियत के अनुसार उन्हें उपहार भी दे. इससे रिश्ते टिकते है, टूटते नहीं.
  10. माँ और पिता का उचित आदर करने से उनका आशीर्वाद मिलता है.
  11. पति/पत्नी एकदूसरे को विशेष उपहार देने से उनका प्रेम बढता है.
  12. पुत्र-पुत्री के साथ मित्रतापूर्वक व्यवहार करने से तथा अपनी हैसियत के अनुसार उन्हें उपहार देने से उनका भी माता-पिता के प्रति लगाव बढता है, आदर बढता है. घर में सुखशांति रहती है.
  13. अतिथि देवो भवः कहा गया है. जब कोई रिश्तेदार अपने घर अतिथि बनके आता है, तो उसका उचित आदर होना चाहिए. इससे रिश्ते मजबूत होते है.
  14. रिश्तों से परिवार बनता है, कई परिवारों से समाज बनता है. समाज से भी अपना एक रिश्ता बनता है.
  15. समाज से रिश्ता मजबूत करने के लिए, तथा समाज का स्नेह तथा प्रेम प्राप्त करने के लिए व्यक्ति ने उपहार अर्थात दान करना चाहिए. अन्नदान, वस्त्रदान करना चाहिए. शिक्षा, सेवा तथा अन्य सामाजिक कार्य करना चाहिए.
  16. जबसे मनुष्य शरीर धारण करता है रिश्तेदारों से रिश्ता बनता है. मात्र अपने आत्मा का रिश्ता तो ईश्वर से है. इसलिए ईश्वर से भी अपना रिश्ता बनाये रखे. ईश्वर का ध्यान करें. यही आपका एकमात्र ईश्वर के प्रति कर्तव्य कर्म है.
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