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44. भोग

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
  2. अ… उ…. म…. ।
  3. ईश्वर परमदयालु परमात्मा है ।
  4. ईश्वर की सभी मानवों पर समदृष्टी है।
  5. मनुष्य को जीवन में जो कष्ट-दुःख आते है इन्हें भोग कहा जाता है। प्रत्येक मानव को यह भोग भोगने ही होते है। तुम इन भोगों को सहन करो। समय के साथ ये भी दूर होंगे।
  6. ये भोग ईश्वर नहीं देता, बल्कि ये भोग मनुष्य के गलत कर्मों का संचय है।
  7. मनुष्य बहोत कलाबाजी होता है, वह इन भोगों से छुटकारा पाना चाहता है। वह अपने दोषों, गलतियों को दूसरों पर धकेलता रहता है। किन्तु याद रहे प्रकृति कभी गलती नहीं करती।
  8. मनुष्य इन भोगोसे पलायन करने की न सोचे। ये भोग कभी ना कभी भोगने ही है।
  9. कुछ लोग भोगों से भागने के लिए आत्महत्या करते है, किन्तु आनेवाले जनम में भी ये भोग भोगने ही होते है। प्रकृति अपना खाता कभी भी अधूरा नहीं छोडती। जहा से खतम किया फिर से वहा से ही शुरू करना पड़ता है।
  10. कुछ लोग गांव छोड़ते है, दूसरे गांव में बसते है, फिर भी उन्हें छुटकारा नहीं मिलता। प्रकृति अपना हिसाब पूरा करती ही है।
  11. जो मनुष्य यह समझता है की इन भोगों से पलायन करने से, भागने से वे इससे छुटकारा पाएंगे, वे गलत सोचते है। भोगों से छुटकारा कदापि नहीं है। यह प्रकृति का नियम है, जिसे पूरा करना ही होता है।
  12. तुम्हारे जीवन में जितने ही भोग है तुम उन्हें भोगो, सहन करो, जैसे ही वे खत्म होगें, वहा से तुम्हारा नया जीवन प्रारंभ होगा।
  13. ईश्वर की उपासना करने से, नामस्मरण करने से मनुष्य इस भोगों को आसानीसे सहन करता है, उसे ये भोग सहने की शक्ति प्राप्त होती है।
  14. ईश्वर की भक्ति से भोग छोटे लगते है।
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