धर्म मार्गदर्शन

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42. कर्म

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
  2. ईश्वर की तुम उपासना करो आखिर उसी ने तुम्हे बनाया है। ईश्वर की उपासना करना तुम्हारा कर्तव्यकर्म है।
  3. दुनिया में सब कुछ ईश्वर के अधीन है, फिर भी ईश्वर ने मनुष्य को विचार और कर्म करने का स्वातंत्र्य दिया है।
  4. मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है।
  5. ईश्वर ने मनष्य को सबकुछ दिया है, वह उसे तभी प्राप्त होगा, जब वह उस दिशा में कार्य करेगा।
  6. कर्म से योग्यता बढती है और योग्यतानुसार फल प्राप्त होता है।
  7. नियत कर्म करते रहो, अकर्म से कर्म कभीभी श्रेष्ट है।
  8. कर्म ही जीवन का ध्येय साध्य करने का एकमात्र पर्याय है।
  9. भगवद्गीता ने कहा है की कर्म के बिना शरीर का निर्वाह करना भी मुश्किल है इसलिए कर्म ही श्रेष्ट है।
  10. लोग फल की आशा से ही कर्म करते है, और जब फल नहीं मिलता तो दुखी होते है। इस दुःख से दूर रहने का एकमात्र उपाय ही निष्काम कर्म करना।
  11. कर्म करते रहो फल की आशा मत करो इसका अर्थ यह नहीं है की तुम फुकट में काम करो।
  12. जब किसान खेती करता है, तो वह फल की इच्छा करता है की उसे अच्छा उत्पन्न हो। किन्तु जब उसे अपेक्षानुसार उत्पन्न नहीं होता तो वह दुखी होता है। इसीतरह व्यापारी भी कर्म करता है फल प्राप्त होने के लिए लेकिन जब फायदा नहीं होता है तो वह भी दुखी होता है। इसलिए भगवद्गीता ने कहा है की फल की इच्छा/चिंता मत करो. यह ही सुखी रहने का एकमात्र पर्याय है।
  13. तुम्हारी सारी इच्छाए/चिंताए ईश्वर पर छोड दो। जब कोई मनुष्य अपनी सारी चिंताए/इच्छाए ईश्वर पर छोड देता है तो वह एक सुखी जीवन जीता है।
  14. कुछ लोग इतने सपने देखते रहते है कि आखिर वे कुछ नहीं करते और वे कर्म से मुकर जाते है। अतः उनके जीवन में निराशा, चिंता, अकर्मण्यता आती है।
  15. कर्म का त्याग यह भयंकर है। तुम सतत कुछ ना कुछ कर्म करते रहो। छोटा बच्चा जैसे सदैव कुछ ना कुछ करते रहता है तुम भी सतत कर्म करते रहो।
  16. कोई भी कर्म हो उनका फल आज नहीं तो कल मिलता ही है। कर्म विफल नहीं जाते।
  17. अच्छे कर्मों का अच्छा फल और बुरे कर्मों का बुरा फल यह निश्चित है।
  18. आज तुम जो हो, वह तुम्हारे कर्मों का ही नतीजा है।
  19. आज जो तुम कार्य करते हो, यह तुम्हारे भविष्य की नीव है।
  20. जो व्यक्ति कर्मफल की इच्छा से मुक्त होकर, कर्म करते हुए कर्मबंधन में नहीं बंधता वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
  21. प्रत्येक व्यक्ति का कार्मिक खाता होता है। तुम्हारे अच्छे बुरे कर्म उस खाते में जमा होते रहते है। और उसके अनुसार ही तुम्हे आज नहीं तो कल फल प्राप्त होता है।
  22. बीज लगाओगे तो पौधा बनेगा, उसका पेड़ होगा, फिर उसे फल लगेंगे। यह प्रकृति का नियम है। तुम्हारे प्रत्येक कर्म बीज समान है।
  23. तुम्हे कितना भी दुःख हो, फिर भी तुम ईश्वर के प्रति तुम्हारे कर्तव्यकर्म को न भूलो।
  24. ईश्वर की उपासना ही एकमात्र आध्यात्मिक कर्तव्य कर्म है।
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