धर्म मार्गदर्शन

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40. संतान

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
  2. विवाह करने के बाद लोगों को संतान की चाह होती है। विवाह होने के बाद संतान होना आवश्यक है। आख़िरकार विवाह का उद्देश संतान प्राप्त करना ही है।
  3. कुछ लोगों को आसानी से संतान होती है तो कुछ लोगों को इसके लिए प्रयास करने होते है।
  4. मानव को प्रेम क्या है इसका अनुभव संतान प्राप्त होने के बाद ही आता है।
  5. जब किसी व्यक्ति को संतान होती है वह माता या पिता बनता है तभी वह माता-पिता के अंतर्मन को जानता है उनके प्रेम को समझता है।
  6. माता-पिता संतान से बिनाशर्त प्रेम करते है। यह प्रेम ही दुनिया का एकमात्र बिनाशर्त प्रेम है।
  7. पति-पत्नी में प्रेम और स्नेह को नित्य अविरत रहने के लिए संतान का होना आवश्यक है। संतान ही पति-पत्नी को जोड़े रखता है।
  8. सभी संतान अर्थात पुत्र या पुत्री एकसमान है, माता-पिता सभी से एकसमान प्रेम करते है।
  9. वंश को आगे बढ़ाने के लिए कुछ लोगों को पुत्र की चाह होती है। वंश को आगे बढ़ाना पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाना माना जाता है। यह एक पुण्यकर्म है। किन्तु प्रत्येक घर में पुत्री होना और उसका कन्यादान करना यह भी पुण्यकर्म है।
  10. कन्यादान यह महादान कहा गया है। शास्त्रों में लिखा है जो माता-पिता कन्यादान करते है वे नरक में कभी नहीं जाते। अर्थात जिन्हें पुत्री है वे भाग्यशाली है उन्हें नरकभोग नहीं है।
  11. शास्त्रोने कहा है जहाँ पुत्री है वहा लक्ष्मी का निवास होता है अर्थात वहां समृद्धि आती है।
  12. पुत्री हो या पुत्र दोनों समान है। महत्वपूर्ण है संतानप्राप्ति।
  13. कुछ लोगों को संतान प्राप्ति नहीं होती। इसके अनेक कारण हो सकते है-शारीरिक या मानसिक कारण भी हो सकते है।
  14. जो लोग व्यभिचार करते है, मादक पदार्थो का सेवन करते है-शराब या अन्य नशा करते है, धूम्रपान करते है, व्यर्थ की चिंता करते है उनमे शुक्राणु की संख्या कम हो सकती है, जिससे उन्हें संतान प्राप्ति नहीं होती।
  15. कुछ पुस्तकों में लिखा है कि जो दाम्पत्य स्त्री की मासिक अवस्था के दिन से शुरुवात के चार दिन छोड कर अन्य सम दिन को सम्बन्ध रखते है उन्हें पुत्र होता है और जो विषम दिन में उन्हें पुत्री होती है। मात्र पुत्र या पुत्री होना यह पति-पत्नी दोनों के प्रकृति और प्रारब्ध पर निर्भर होता है।
  16. संतान के कारण ही घरों में रौनक आती है, तथा आगे रिश्ते नाते बनते है।
  17. संतान पर बारा साल की उम्र तक ही संस्कार किये जा सकते है। इसलिए प्रत्येक माता-पिता ने अपने बच्चों पर १२ साल की उम्र तक बड़े प्यार और दुलार से अच्छे संस्कार करने चाहिए। बच्चों को कदापि मारना नहीं चाहिए। उन्हें समझाना चाहिए।
  18. बच्चा एक खिलौना तभी त्यागता है जब उसे दूसरा खिलौना मिलता है । इसलिए बच्चों को किसी चीज त्यागने को कहने के बजाये उन्हें दूसरा अच्छा विकल्प बताये। फिर भी उन्हें सही क्या गलत क्या यह अवश्य बताये। उन्हें धर्म क्या अधर्म क्या, देशहित क्या और देशद्रोह क्या यह भी बताये।
  19. यह उम्र निकलने के बाद उनपर संस्कार नहीं होते। उन्हें अनुशासन भी सिखाए अन्यथा माता-पिता को सारी उम्र पछताना पड़ता है।
  20. बारा साल से सोलह साल की उम्र तक बच्चों से मित्रता पूर्वक व्यवहार करें। उन्हें मित्रतापूर्वक समझाये।
  21. सोलह साल से आगे बच्चे अर्थात युवा भावनावश होते है। वे भावनाओं में बहते है। इसलिए उनके साथ मित्र बनकर उनका मार्गदर्शन करें।
  22. बच्चे ही माता-पिता की असली संपत्ति है। बच्चे बिघड गए या गलत रास्तों पर गए तो माता-पिता की संपत्ति क्या काम की?
  23. माता-पिता समय निकालकर बच्चों के साथ बाते करें, चर्चा करें, उनके साथ समय बिताए। उनके विचारों को, बातों को सुनकर अपने विचार प्रस्तुत करें।
  24. उन्हें बुराई से बचाए, गलत लोगों से बचाए, असुर प्रवृत्ति से बचाए। उन्हें असुरमार्ग से बचाये।
  25. माता-पिता को देखकर ही बच्चे सिखते है। वे माता-पिता का अनुकरण करते है। इसलिए घर में माता-पिता एकदूसरे से अच्छा व्यवहार रखे।
  26. अच्छी संतान को उत्पन्न करना ही धर्मसेवा, समाजसेवा और देशसेवा है।
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