धर्म मार्गदर्शन

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38. दान

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
2. ईश्वर परमदयालु परमात्मा है। ईश्वर की आप सभी पर कृपा है।
3. यह सारी सृष्टि ईश्वर की है। आपके पास जो भी है वह ईश्वर का ही है और जो भी आप अर्जित करते हो वह भी ईश्वर का ही है।
4. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह किताब आपका अज्ञान दूर करके आपको ज्ञानमार्ग दिखता है। तुम्हे योग्य धर्म मार्गदर्शन देता है।
5. दान देना यह पुण्य का कार्य है एक अच्छा कर्म है, सबसे अच्छा कर्म है।
6. दान से तुम्हारे मार्ग की सभी बाधाएं दूर होकर तुम्हारे उद्धार का मार्ग प्रशस्त होता है।
7. दान क्या है? दान किसे देते है? और कितना देते है? यह जानना तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है।
8. अपने कमाई का कुछ हिस्सा ईश्वर को देना, धर्म को देना, धर्म का कार्य करनेवालों को देना ही दानधर्म है।
9. तुम धर्मकार्य करनेवालों को दान देते रहो। किसी अनजाने व्यक्ति को या असुर प्रवृतियों के लोगों को दान मत दो, पाप के भागीदार मत बनो।
10.अपनी कमाई का एक प्रतिशत हिस्सा हर महीने दान में दे। जो धनवान है वे एक प्रतिशत या अपनी हैसियत के अनुसार दान करें। जो लोग गरीब है वे महीने में केवल एक रूपया दान कर सकते है, किन्तु गरीब पर कोई जोर नहीं है। वह दान न दे तो भी कोई दोष नहीं। वे ईश्वर की भक्ति, नामस्मरण, ध्यान-उपासना करें, इस योग्य मार्ग पर कायम रहे, यही यश और समृद्धि का मार्ग है।
11. जो लोग निरंतर दान देते है उनके घर में लक्ष्मी का वास्तव्य रहता है। निरंतर दान देनेवालों को वैभव प्राप्त होता है।
12. खर्च करने से पहले समृद्धि का तरीका जानना चाहिए, वह तरीका है दान करना।
13. प्राचीनकाल में लोग इसमें सोना, चांदी, जमीन, जेवरात, गाय, धान्य दानस्वरुप में देते थे। तुम्हे इतना सबकुछ देने की आवश्यकता नहीं, तुम केवल अपने कमाई का एक प्रतिशत धर्म के लिए दान करो।
14. हर महीना सबसे पहले ईश्वर को दो, आपके पसंद के आध्यात्मिक संस्था को जहाँ निराकार परमेश्वर ॐ का उच्चारण होता है, जहाँ से आप आद्यात्मिक सहायता और प्रेरणा प्राप्त करते हो, वहाँ निरंतर दान करते रहो।
15. बचत के साथ दान को महत्त्व दो। दान करने से मनुष्य वास्तव में अपनी ही संपत्ति बढाता है, वह अपनी कीर्ति बढाता है।
16. गृहस्थी अपने हैसियत के अनुसार दान करें। दान करने के लिए आपके आत्मा पर कोई बोझ नहीं है। याद रखो निरंतर दान देना ही सफलता का रहस्य है। परिवार के लोगों को अन्न, वस्त्र देने से उनमे मौजूद कलुषता नष्ट होती है।
17. बहोत लोगों को यह शिकायत रहती है कि उनका पैसा बीमारी में या व्यर्थकार्यों में खर्च होता है, उनके पास पैसा नहीं रहता। ऐसे लोग अपनी क्षमता के अनुसार तुरंत दान देना प्रारंभ करें।
18. दान करने की कृति तुम्हारे बढती समृद्धि को आश्वस्त करेगी, तुम्हे आरोग्य और मनशांति देगी। वास्तव में दान यह आर्थिक निवेश है।
19. जो लोग दान करने से बचने का बहाना ढूंडते है और अनावश्यक खर्च करते है, वास्तव में वे खुद को ही लुट रहे होते है। वे समस्याओं तथा नुकसान को आमंत्रित करते है।
20. आपका दान सात्विक होना चाहिए, न की राजसिक या तामसिक। जहाँ सात्विकता है वहाँ ही दान करो। असुर प्रवृति को दान मत करो, अधोगति का रास्ता मत चुनो।
21. जहाँ दान करते हो वहाँ किसी भी तरह की मांग मत रखो। दान के बदले में कुछ प्राप्त करना यह दान नहीं है।
22. दान करो तो मुक्त होकर और आनंदी होकर दान करो। दान करने से तुम निरंतर धनवान बनोगे यह लालच मत करो।
23. दान करने से आसक्ति छुटती है, तब सुख प्राप्त होता है।
24. उधार देना दान नहीं है।
25. उधार देने से दुःख प्राप्त होता है, क्योंकि उसमे आसक्ति रहती है, आज मिलेगी, कल मिलेगी, लेकिन वह मिलती ही नहीं या देरी से मिलती है। उधारी देने से तुम लोगों के विकास को रोकते हो। अगर फिरभी किसी को मदत करना है तो उन्हें दानस्वरुप मदत दो। पैसा वापस मिलेगा इसकी अपेक्षा या चिंता मत करो।
26. जब तक लोग अपने अंदर समृद्ध होने की इच्छाशक्ति को विकसित नहीं करते तब तक वे जरुरतमंद ही बने रहेंगे, उधार मांगते रहेंगे। भले ही आप उनकी कितनी भी मदत करो।
27. लोगों को सम्पन्नता के विचारों से अवगत करना ही सर्वश्रेष्ट कार्य है। वह सम्पन्नता का विचार है अपनी क्षमता के अनुसार दानधर्म करना।
28. जो कोई ईश्वरीय कार्य के लिए निस्वार्थ होकर दान देता है, तो उसे अनेक तरीकों से कई गुना जादा फल मिलता है।

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