धर्म मार्गदर्शन

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37. सुख-दुःख

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
2. मनुष्य जो कर्म करता है उस कर्म से ही उसे सुख-दुःख मिलते है।
3. कुछ सुख-दुःख ऐसे होते है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न होते है, जैसे नैसर्गिक आपदा।
4. प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है, दुःख नहीं चाहता।
5. कुछ सुख-दुःख मनुष्य स्वयं उत्पन्न करता है। तो कुछ सुख-दुःख उसे दुसरे देते है।
6. अगर मनुष्य सुख प्राप्त करना और दुःख दूर करना चाहता है, तो वह ईश्वर की उपासना करें।
7. ईश्वर परम दयालु परमात्मा है, आप सभी पर ईश्वर की कृपा है। अन्तःकरण से की हुई प्रत्येक उपासना ईश्वर के पास पहुचती है।
8. जब आप अन्तःकरण से ईश्वर की उपासना करोगे, तो निश्चय ही ईश्वर आप को सुख देंगे और आपके सभी दुःख दुर करेंगे।
9. मनुष्य हमेशा दुःख को ही बार-बार याद करता है, वह दुःख को ही बार-बार कल्पित करता है, इसलिए ऐसा लगता है की दुनिया में सुख कम और दुःख जादा है।
10. मनुष्य छोटे सुखों को नजर अंदर करता रहता है। और छोटे दुःख को जादा महत्त्व देता रहता है। इससे वह सुखी कम और दुखी जादा रहता है।
11. हे मनुष्यों, छोटे छोटे सुखों को ही बटोरते रहो, तो तुम हमेशा सुखी रहोगे।
12. मनुष्य को दुःखी करने में सबसे बड़ी वजह उसका अहंकार है, इसलिए अहंकार को संयमित करो और सुख प्राप्त करो।
13. लोगों को जब सुख मिलता है, तो वे कुछ भी खाते है, पिते है। जब वे बीमार पड़ते है, दुःखी होते है, तो उन्हें ईश्वर की याद आती है।
14. जब सुख मिलता है, तो वे ऐशोआराम करते है, जब दुःख मिलता है, तो मंदिर में जाते है।
15. सुख में मनुष्य हसता रहता है और दुःख में रोता रहता है।
16. सुख के समय ईश्वर की याद नहीं आती, दुःख के समय ही ईश्वर की याद आती है।
17. वास्तविकता यह है कि सुख में ही दुःख के बिज बोये जाते है, और दुःख में सुख के।
18. सुख-दुःख में सम्यक रहो, वास्तविक शांति इसी से प्राप्त होती है।
19. मनुष्य अपने इन्द्रियों को संयमित करके सुख को प्राप्त कर सकते है, वे उनकी इच्छा, आकांक्षा को अनुशासित करके सुख को प्राप्त कर सकते है। ऐसे लोग प्रायतः सुखी होते है।
20. विचारों को सकारात्मक करके भी सुख को प्राप्त किया जाता है।
21. मनुष्य अपने इन्द्रिय, इच्छा, आकांक्षा को अनुशासित करके दुःख को भी दूर कर सकते है। विचारों को सकारात्मक करके भी दुःख को दूर किया जाता है। यह मनुष्य पर निर्भर है की उसका आत्मबल कितना सबल है।
22. जो लोग दूसरों की देखा-देखी करते है, अपना पैसा बेवजह खर्च करते रहते है, वे हमेशा दुखी रहते है। इसलिए कमाई से जादा खर्च मत करो। सामान्य सरल जीवन जियो, इससे तुम्हे सुख मिलेगा।
23. मनुष्य को चार प्रकार के सुख मिलते है। शारीरिक-सुख, मानसिक-सुख, आर्थिक-सुख और सामाजिक-सुख।
24. शारीरिक-सुख यह शरीर स्वस्थ रहने से तथा कामवासना की पूर्तता होने से प्राप्त होता है।
25. मानसिक-सुख यह ईश्वर की उपासना करने से, देव-देवताओं की मनोभाव पूजा करने से प्राप्त होता है।
26. आर्थिक-सुख यह धन से तथा देवी लक्ष्मी की उपासना से प्राप्त होता है।
27. सामाजिक-सुख यह समाज के साथ सहभागी होकर, स्नेहभाव के साथ मिलजुल कर रहने से प्राप्त होता है।
28. प्रत्येक स्थिति में सम्यकभाव महत्वपूर्ण है। किसी का अतिरेक न करो, ना ही जाद्ती करो। नियम का पालन करो। नीतिमत्ता को कायम करो।
29. कुछ लोग दूसरों को बेवजह दुःख देते है। पडोसी, सहकर्मी या रस्ते में चलते वक्त अनजान दुःख देनेवाले बहोत लोग होते है।
30. आसुरी प्रवृत्ति के लोग बेवजह दुःख देते है। दुसरों को दुःख देना ही उनका स्वभाव है। आसुरी प्रवृत्ति के लोग ईश्वर की सृष्टि में सतत बाधा उत्पन्न करनेवाले लोग है। वे दुःख के भागीदार है।
31. मनुष्य इन दुःख देनावालों से त्रस्त है, तो वह ईश्वर से प्रार्थना करें की –“हे ईश्वर, उनको सद्-बुद्धि दो, उनको शांति प्रदान करो, उनको सुख दो। सबका भला करो, सबकी रक्षा करो और आपका नामस्मरण करने की उन्हें प्रेरणा दो। ॐ शांति, ॐ शांति, ॐ शांति”। यह प्रार्थना सतत करो। इस प्रार्थना से भले ही दुःख देनेवालों पर असर हो न हो, किन्तु आपकी मनोदशा तुरंत बदल जायेगी, आपका मन शांत होगा, आपको सुख प्राप्त होगा।
32. निश्चित ही दुःख देनेवालों को उनके बुरे कर्म का प्रकृति के अनुसार प्रतिफल मिलेगा और वे दुःख के भागीदार बनेंगे।
33. इसलिए दूसरों द्वारा दिए जानेवाले दुःखों से विचलित न हो, ईश्वर की प्रार्थना करो, अपना सुख सुनिश्चित करो।
34. ईश्वर का नामस्मरण करो और अपनी आध्यात्मिक उन्नति करते रहो। इसमें ही निरंतन सुख है।

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