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36. उद्धार

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
2. ईश्वर ही जगत का आधार है।
3. मनुष्य को ईश्वर की आवश्यकता है, ईश्वर के भक्ति के बिना मनुष्य का उद्धार नहीं है।
4. उद्धार अर्थात आत्मा की आध्यात्मिक उपलब्धि, जो मनुष्य को ईश्वर का परमधाम प्राप्त करने में सहाय्यक है।
5. ईश्वर को मानना, पूजना, भक्ति करना आत्मा की आवश्यकता है।
6. इसलिए मनुष्य ईश्वर की आरती, भजन, पूजापाठ और ध्यान करता है। मार्ग अनेक है किन्तु साध्य एक है, ईश्वर।
7. ध्यान-उपासना यह ईश्वर की निराकार उपासना है। तथा अन्य पद्धतिया साकार उपासना है।
8. ध्यान के अनेक प्रकार है। मुख्य दो प्रकार है- ध्यान-तप और ध्यान-उपासना।
9. ध्यान-तप यह योगियों के लिए है, इसमें में कोई कालावधि या समय निश्चित नहीं है।
10. ध्यान-उपासना यह सभी लोगों के लिए है। इसका कालावधि केवल दस मिनिट का है, क्योंकी मनुष्य का मन चंचल होता है, वह दीर्घकाल तक मन केंद्रित नहीं कर सकता, इसलिए ध्यान-उपासना का कालावधि निश्चित है।
11. आरती यह साकार उपासना है। एक समय में साधारणतः १५ मिनिट तक अथवा एक/दो/तिन या पांच से जादा आरतियाँ ना करें। क्योंकि मनुष्य का मन हमेशा भटकता रहता है, वह जादा समय तक अपने मन को केंद्रित नहीं कर सकता।
12. कोई भी उपासना जादा समय तक करने से मनुष्य का मन विचलित होने की संभावना है। विचलित मन द्वारा उपासना करना फलदायी नहीं है। मन की एकाग्रता से की जानेवाली उपासना ही ईश्वर तक पहुचती है। इसलिए जादा समय की उपासना से कम कालावधि की उपासना अच्छी है।
13. भजन यह साकार-भक्ति का उत्तम अविष्कार है। भजन करने से मनुष्य को आनंद प्राप्त होता है। संतो ने भजन को महत्त्व दिया है। भजन का कालावधि तय करें, तय समय से जादा समय भजन न करें, कारण वही विचलित मन। मन की एकाग्रता महत्वपूर्ण है।
14. नामस्मरण यह ईश्वर की भक्ति का सरल उपाय है। मन की गहराई से जब ईश्वर का नामस्मरण किया जाए तो मनुष्य की सारी चिंताए नष्ट होकर मनुष्यों को प्रसन्नता प्राप्त होती है।
15. नामस्मरण सतत और अविरत किया जा सकता है, यह भी एकाग्रता के साथ करें।
16. प्रार्थना यह मन में की जाती है, आप सतत ईश्वर से प्रार्थना कर सकते है। यह नामस्मरण करने जैसा ही है।
17. पूजा-पाठ में ईश्वर का पूजन किया जाता है। “ईश्वर का पूजन” यह साकार भक्ति का विलक्षण आविष्कार है।
18. जिस तरह नामस्मरण, प्रार्थना, आरती, भजन तथा ध्यान स्वयं किया जाता है उसीतरह पूजा-पाठ भी स्वयं करें। यह स्वयं सीखे और करें, यह सरल है।
19. लोग पूजापाठ करने के लिए अर्चकों/पुजारियों को बुलाते है, उनसे पूजापाठ करवाते है। लेकिन यह उचित नहीं है। अर्चक/पुजारियों का कार्य मंदिरों में पूजा करना, मंदिरों की व्यवस्था कायम करना है, मंदिरों में स्वच्छता रखना तथा लोगों को पूजापाठ में मार्गदर्शन करना है ताकि धर्म-व्यवस्था में अनुशासन बना रहे। जिन लोगों को पूजापाठ का मार्गदर्शन नहीं है वे अर्चक/पुजारी से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते है, किन्तु उन्हें स्वयं ही पूजा-पाठ करना है, तभी इसका लाभ उन्हें मिलेगा।
20. ध्यान, नामस्मरण, प्रार्थना, आरती, भजन, पूजापाठ यह शुद्ध श्रद्धाभाव से, अन्तःकरण से किया जाए तो ही वह ईश्वर तक पहुचती है। तभी ईश्वर की कृपा मनुष्य को प्राप्त होकर मनुष्य का उद्धार होता है।
21. इसमें अनुशासन रखे और कोई भी अतिरेक न करें। इसमें आपकी आत्मा पर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है।
22. ध्यान यह निराकार उपासना है, इस उपासना को व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों प्रकार से किया जाता है।
23. अवश्य ध्यान-उपासना को सामूहिकता से करो। कम से कम आठ-दस लोगों को एकत्रित करके ध्यान-उपासना को आयोजित करो।
24. समाज की सामूहिक शक्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए सामूहिक ध्यान-उपासना का महत्त्व है।
25. इसलिए तुम ध्यानालयों का निर्माण करो, तय समय पर ध्यान-उपासना करो, इससे तुम्हारा तथा समाज और देश का उद्धार होगा।
26. धर्म का ज्ञान महत्वपूर्ण है, किन्तु उद्धार के लिए धर्म का अनुकरण करना आवश्यक है।
27. तुम धर्म का अनुकरण करो और अपना उद्धार सुनिश्चित करो।

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