धर्म मार्गदर्शन

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34. श्रद्धा

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
  2. ईश्वर पर तुम श्रद्धा रखो क्योंकि ईश्वर ने ही तुम्हे बनाया है।
  3. ईश्वर तुम्हारा निर्माता है, इस सृष्टि का निर्माता है।
  4. किन्तु तुम्हारी श्रद्धा सात्विक होनी चाहिए। इस श्रद्धा में कोई लोभ, द्वेष, मत्सर न हो।
  5. ईश्वर के प्रति तुम्हे कर्तव्यबोध हो।
  6. तुम्हारी श्रद्धा में ईश्वर के प्रति आद्यकर्तव्यकर्मभाव हो।
  7. भगवदगीता में श्रद्धा के तिन प्रकार बताये है। एक- सात्विक, दुसरी- राजसिक और तीसरी- तामसिक।
  8. सात्विक श्रद्धा में लोग ईश्वर और देवताओं की उपासना करते है। राजसिक श्रद्धा में लोग यक्ष और राक्षसों को मानते है। तामसिक श्रद्धा में लोग भुत, प्रेतों को मानते है।
  9. सात्विक श्रद्धा में ईश्वर के निराकार और साकार दोनों उपासना को मान्यता है। इसी श्रद्धा से व्यक्ति को भौतिकसुख, शांति और मोक्ष मिलता है। इसी श्रद्धा से मनुष्य को आध्यात्मिक लोक अर्थात ईश्वर के परमधाम की प्राप्ति होती है।
  10. राजसिक श्रद्धा में यक्ष (धुत, फ़रिश्ते, पैगम्बर) तथा राक्षस (असुर) को माना जाता है। इस श्रद्धा में मनुष्य इर्शालू बनता है। इसमें सुख, शांति का अभाव होता है, इससे ईश्वर का परमधाम नहीं मिलता। इस श्रद्धा में वे उनकी कथित देवता का हवाला देते रहते है। वास्तविकता यह है की यह उनके लिए एक बहाना है। वे ईश्वर का बहाना करते रहते है, वास्तव में वे ईश्वर को मानते ही नहीं, बल्कि ईश्वर के नाम पर, उनके श्रद्धा की उत्पत्ति केवल साम्राज्य बढ़ाने और राज्य स्थापित करने के लिए हुई है, अर्थात राजसिक है।
  11. तामसिक श्रद्धा में भुत, प्रेत (दरगाह, मजार, लटका पुतला या लाश) को माना जाता है। यह श्रद्धा अघोरी है। यह अत्यंत भयंकर और अधोगति में डालने वाली श्रद्धा है। इससे मनुष्य के आत्मा को मुक्ति मिलना दुर्लभ है। जो मनुष्य इस श्रद्धा को मानता है वह भवसागर में भटकता रहता है।
  12. हे मनुष्यों, तुम सात्विक बनो, किसी भी तरह के राजसिक और तामसिक श्रद्धा का सहारा मत लो। अपने आप को अधोगति से दूर रखो। और सात्विक श्रद्धा अर्थात सनातन वैदिक हिन्दुधर्म पर अपनी आस्था दृढ़ रखो।
  13. जो लोग राजसिक और तामसिक श्रद्धा को मानते है वे अपनी आध्यात्मिक प्रगति को रोकते है। इसलिए तुम सात्विक उपासना करो।
  14. जो निराकार उपासक है वे ईश्वर के निराकार नाम ॐ का उच्चारण करे और ध्यान उपासना करे। ध्यान-उपासना ही निराकार ईश्वर की एकमात्र उपासना है।
  15. निराकार उपासना में ईश्वर का कोई घर नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई पत्थर नहीं, कोई भी जड वस्तु या वास्तु नहीं है। अगर है तो वह निराकार उपासना नहीं है। तुम सावधानी से निराकार उपासना करो।
  16. निराकार उपासना में कोई त्यौहार नहीं, कोई कर्मकांड नहीं, कोई उपवास नहीं होते। कोई नाचना, गाना बजाना, कव्वाली, संगीत बजाना नहीं, कोई बलि, क़ुरबानी नहीं। इसमें ना किसी का विरोध, ना द्वेष नहीं होता।
  17. केवल ईश्वर का ध्यान ही निराकार ईश्वर की उपासना है।
  18. तुम ॐ का उच्चारण करते हुए ध्यान करो। यह ध्यान-उपासना ही शुद्ध निराकार उपासना है।
  19. निराकार उपासना में शुद्धता ही मनुष्य को शांति-मार्ग पर लाती है और मनुष्य का उद्धार करती है।
  20. ईश्वर को निराकार और साकार दोनों उपासनाये मान्य है। ये दोनों उपासना एक दूसरे के विरोध में नहीं। इनमे समन्वय है।
  21. साकार उपासना में तुम केवल ईश्वर के विविधरूपों की मूर्ति, देव-देवताओं की मूर्ति की शुद्ध भाव से पूजा-पाठ करो।
  22. साकार उपासना में मूर्ति का महत्त्व है। यह मूर्ति तुम्हारे लिए ईश्वर का पूजन करने का साधन है। अपनी श्रद्धा को केंद्रित करने का साधन है। तुम्हारा साध्य केवल ईश्वर है।
  23. सामान्यजन के लिए मन की शांति, भौतिक-सुख प्राप्त करने के लिए साकार उपासना लाभकारी है।
  24. इन दोनों उपासना में तुम्हारे मन और आत्मा पर कोई बोझ नहीं है।
  25. इस सात्विक उपासना से ही तुम्हारा मन सात्विक होता है। तुम इसी श्रद्धा पर कायम रहकर अपना आध्यात्मिक उद्धार सुनिश्चित करो।

 

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