धर्म मार्गदर्शन

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33. कर्मकांड

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
  2. ईश्वर सब जानता है और सबकी खबर रखता है। तुम ईश्वर से कुछ छुपा नहीं सकते।
  3. तुम ईश्वर के प्रति जो भी कर्मकांड करते हो, वह सब ईश्वर देखता है।
  4. कर्मकांड का अर्थ है विधियाँ। ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए तुम जो विधियाँ करते हो उसे कर्मकांड कहा जाता है।
  5. सच ये है कि ईश्वर की तुमपर सदैव कृपा रहती है किन्तु तुम्हारा मन उस कृपा को प्राप्त करने के लिए सशक्त/अनुकूल नहीं होता। दुर्बल मन ईश्वर की कृपा को आत्मसात नहीं कर सकता।
  6. तुम्हारा मन ईश्वर-भक्ति से भरा हुआ होना चाहिए तभी ईश्वर-कृपा तुमपर प्रकट  होती है।
  7. मनुष्य के मन में श्रद्धा होने के बावजूद भी उस श्रद्धा को फल-प्राप्ति हेतु उपयोग करने का एक मार्ग है कर्मकांड।
  8. श्रद्धा के साथ कर्मकांड किये जाए तो वे फलदायी होते है।
  9. कर्मकांड यह मनुष्य की श्रद्धा को दृढ़ करके क्रियान्वित करने की एक विधि है।
  10. एक कथा सुनो, सखाराम और बकाराम दो मित्र थे। दोनों अविवाहित थे। दोनों का विवाह नहीं हो रहा था।
  11. एकदिन उनके गांव में एक साधू आया। वह साधू ज्ञानी था। साधू की सभी ओर कीर्ति फैली थी कि वह जो भी उपाय बताता है, उसे करने से मनुष्य की मनोकामना पूर्ण होती है।
  12. साधू की कीर्ति सुनकर ये दोनों मित्र साधू के पास गए और उनसे पूछा, “हमारा विवाह नहीं हो रहा है, इसके लिए कुछ उपाय बताये।” साधू ने उनको गौर से देखा, देखकर साधू ने एक अनुमान बनाया और उपाय बताया, “तुम दोनों भगवान शिव के मंदिर में जाकर शिव की पिंड पर शिवनाम का जप करते हुए जल अर्पण करो। तुम्हारा विवाह हो जायेगा।” दोनों को एक ही उपाय बताया।
  13. सखाराम श्रद्धावान था, उसे पूरा विश्वास था कि यह उपाय करने से उसकी मनोकामना पूरी होगी।
  14. दूसरे दिन सुबह, सखाराम शिवमंदिर गया और बड़ी श्रद्धा के साथ भगवान शिव के पिंड पर जल अर्पण करते हुए मन की गहराई से प्रार्थना की कि उसकी मनोकामना पूर्ण हो। इस कर्मकांड से उसके मन में यह विश्वास भर गया की अब उसकी मनोकामना निश्चित पूर्ण होगी।
  15. बकाराम सखाराम जैसा भक्त नहीं था, उसके मन में संदेह था, उसने सोचा कि क्या साधू का उपाय काम करेगा? चलो देखते है, ऐसा कह कर वह शिवमंदिर गया और भगवान शिव के पिंड पर जल अर्पण करते हुए उसने प्रार्थना की, “हे महादेव, अगर आप मेरी मनोकामना पूरी करेंगे तो में आपके पिंड पर केवल जल नहीं दूध भी चढाऊंगा। आपको हमेशा प्रसन्न रखूँगा।”  मानो उसने भगवान शिव से कोई समझौता किया हो।
  16. इन दोनों के भक्ति में अंतर है।
  17. कुछ दिन बाद, सखाराम का विवाह हुआ। उसकी मनोकामना पूरी हुई, लेकिन बकाराम की मनोकामना पूरी नहीं हुई। बकाराम बोला, “यह सब कर्मकांड व्यर्थ है।”
  18. सखाराम की इच्छा पूर्ण हुई, लेकिन बकाराम की नहीं। ऐसा क्यों? सखाराम ने  अंतर्मन से प्रार्थना की थी। बकाराम ने केवल बाहरी मन से प्रार्थना की थी।
  19. जब मनुष्य अंतर्मन से प्रार्थना करता है तो उसकी प्रार्थना अंतर्मन से आत्मा तक और आत्मा से परमात्मा पहुचती है। अर्थात व्यक्ति से समष्टि तक पहुचती है।
  20. जब प्रार्थना व्यक्ति से समष्टि अर्थात ईश्वर तक पहुचती है तभी वह परिणाम लाती है।
  21. इसलिए जो प्रार्थना अंतर्मन से की जाती है वह ही ईश्वर तक पहुचती है और सफल होती है।
  22. कर्मकांड तो क्रिया है, यह क्रिया करते वक्त अगर मनुष्य श्रद्धा के साथ प्रार्थना करे तो वह परमात्मा तक पहुचती है। कर्मकांड श्रद्धा को अवतरित करने का साधन है।
  23. कर्मकांड करने के लिए ईश्वर का आपकी आत्मा पर कोई बोझ नहीं है। आप अगर श्रद्धापूर्वक ध्यान-उपासना करे तो आपको कर्मकांड करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
  24. जिनको कर्मकांड करने की इच्छा है उनको बड़े बड़े या महेंगे कर्मकांड करने की भी  कोई सक्ति नहीं है। याद रहे की धर्म में कोई सक्ति नहीं होती। आपको जितना हो सके उतने ही कर्मकांड करें।
  25. कुछ लोग बड़े धनवान होते है, वे समझते है की उन्हें कर्मकांड करने की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु अगर उनके मन में दौर्बल्य है, तो वे कम से कम एक छोटा कर्मकांड अवश्य करें, एखाद नारियल या फूल भगवान को अर्पित करें, इससे उनके मन का दौर्बल्य दूर होगा।
  26. ईश्वर मन को सामर्थ्य देनेवाला है। ईश्वर मनसामर्थ्यदाता है। ईश्वर के नाम का जप आपके मन को सामर्थ्य देता है।
  27. जिनको कर्मकांड के मन्त्र मालूम नहीं वे ईश्वर के नाम का जप करें तथा ध्यान-उपासना करें। श्रद्धा पूर्वक की हुई ध्यान-उपासना सबसे श्रेष्ठ है।
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