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32. सफलता

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः।
  2. अ…. उ…. म….। ईश्वर सर्वत्र है।
  3. ईश्वर तुम्हारे आसपास भी है। और तुम्हारे अंतकरण में भी है।
  4. वह तुम्हारे प्राण में भी है तुम्हारे ध्यान में भी है।
  5. तुम्हे जो भी मिलता है वह ईश्वर का ही है। सफलता भी तुम्हे ईश्वर ही देता है।
  6. भगवद्-गीता ने सफलता प्राप्त करने के लिए निरंतर कर्म और ईश्वर का नित्य स्मरण करने के लिए कहा है।
  7. जैसे तुम तुम्हारे सभी कार्य करते समय सांस लेना बंद नहीं करते, उसी तरह तुम कर्म करते समय ईश्वर का अन्तकरण में नित्य स्मरण करते रहो। यह जीवन में सफलता का लक्षण है।
  8. प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है। जीवन में सफलता महत्वपूर्ण है।
  9. प्रत्येक व्यक्ति के लिए सफलता के मायने अलग-अलग है। किसी को प्रेम में सफलता चाहिए, किसी को नौकरी-व्यवसाय में सफलता चाहिए, किसी को धन कमाने में सफलता चाहिए, किसी को आरोग्य में सफलता चाहिए, किसी को प्रसिद्धि प्राप्त करने में सफलता चाहिए।
  10. कुछ लोगों को धन मिलेगा किन्तु आरोग्य नहीं, प्रसिद्धि मिलेगी प्रेम नहीं, प्रेम मिलेगा धन नहीं, यह पूर्ण सफलता नहीं है।
  11. कुछ लोगो के जीवन में भयंकर बिमारिया आती है, कुछ लोगों का असमय मृत्यु होता है, कुछ लोगों के साथ अपघात या घातपात होता है, यह असफलता ही है।
  12. कुछ लोगों को बहोत मेहनत करने के बावजूद भी सफलता नहीं मिलती, क्योंकि सफलता के लिए ईश्वर भक्ति की आवश्यकता होती है।
  13. जो लोग ईश्वर, देवी-देवताओं की उपासना, भक्ति, ध्यान करते है उनके सारे संकट दूर होते है। और उन्हें सफलता प्राप्त होती है।
  14. सफलता दो प्रकार की होती है एक आध्यात्मिक सफलता और एक भौतिक सफलता।
  15. आध्यात्मिक सफलता अर्थात ईश्वर का परमधाम/मोक्ष। यह प्राप्त होना ही आध्यात्मिक सफलता है।
  16. जो मनुष्य ईश्वर का निरंतर स्मरण करता है, अपने सभी कर्म ईश्वर को सौपता है, आसक्ति विरहित जीवन जीता है, यह आध्यात्मिक सफलता का लक्षण  है।
  17. भौतिक सफलता का मतलब इस भौतिक जीवन में मनुष्य को अपनी इच्छाओ के अनुसार सुख-सुविधाए प्राप्त होना। मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक इच्छाओं की परिपूर्ति होना ही भौतिक सफलता है।
  18. भौतिक सफलता भी दो प्रकार की होती है- व्यक्तिगत और सामूहिक।
  19. व्यक्तिगत सफलता में – अच्छा जीवन साथी मिलना, नौकरी मिलना, व्यवसाय में लाभ होना, अच्छा आरोग्य प्राप्त होना, पैसा मिलना, पैसा अपने पास टिकना, प्रसिद्धि मिलना ईत्यादी है।
  20. ईश्वर निराकार है, अदृश्य है, किन्तु ईश्वर ने कई साकाररूप धारण किये है। ईश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। ईश्वर मनुष्य के लिए साकार रूप में प्रकट होते है।
  21. देवी-देवता, तुम्हारी कुलदेवता भी ईश्वर का ही रूप है। तुम तुम्हारे कुलदेवता की उपासना करो। यह भौतिक सफलता का मार्ग है।
  22. हमने देखा है, इससे कई लोगों की बिमारिया दूर हुई, कई लोग मरते-मरते बचे। कई लोगों को उनके इच्छानुसार भौतिक सफलता मिली।
  23. किन्तु जो लोग असुर प्रवृत्ति के ठिकानो पर जाते है, उनके लिए सफलता नहीं अधोगति होती है।
  24. तुम केवल ईश्वर तथा ईश्वर के साकार स्वरुप देवी-देवताओं को मानो, उनकी प्रार्थना करो, यह तुम्हारे लिए सफलता का मार्ग है। और इसी मार्ग में सात्विकता है।
  25. तुम्हारी जो देवता है, उस देवता को तुम अपनी अन्तकरण से पूजो। इसके लिए तुम्हे बड़े-बड़े कर्मकांड करने की आवश्यकता नहीं, तुम्हे जादा धन खर्च करने की आवश्यकता नहीं। तुम्हे तो बस श्रद्धा पूर्वक अन्तकरण से ईश्वर की भक्ति करना है। अगर कोई कर्मकांड करना ही है तो थोडा बहोत करो एखाद नारियल चढाओ, यह सब श्रद्धा पूर्वक करो। यह सफलता का रहस्य है।
  26. तुम धनवान हो, पढ़े लिखे हो, तुम्हारा पद बड़ा है, यह अहंकार ईश्वर के सामने चलता नहीं।
  27. तुम कितने भी बड़े क्यों न हो, तुम कितने भी पढ़े लिखे क्यों न हो, तुम कितने भी धनवान क्यों न हो, आखिर तुम्हे खाली हाथ ईश्वर के पास ही लौटना है, तुम्हारे पास जो भी है वह ईश्वर का ही है, इसलिए घमंड मत करो। ईश्वर को शरण आओ, यही सफलता है।
  28. तुम्हारा दृढ़-विश्वास ही सफलता का रहस्य है।
  29. अब तुम सामूहिक सफलता के बारे में जानो। अगर तुम एक कौम के रूप में सफल होना चाहते हो, एक समाज के रूप में, एक राष्ट्र के रूप में सफलता चाहते हो तो तुम ईश्वर की ध्यान-उपासना करो, तुम ध्यानालयों का निर्माण करो।
  30. वेदो के अनुसार, हमने तुम्हे जिसप्रकार बताया है उसप्रकार तुम उपासना करो। तुम ध्यानालय में कम से कम दो बार सुबह, शाम उपासना के लिए एकत्रित आओ। यह तुम्हारे लिए सामूहिक सफलता का रहस्य है।
  31. तुम किसी असुर परंपरा को मत मानो, यह आध्यात्मिक अधोगति है, इसमें आध्यात्मिक सफलता नहीं।
  32. तुम ध्यान-उपासना की व्यवस्था स्थापित करो, ध्यानालयों का निर्माण करो। लोगों को आग्रहपूर्वक बुलाओ और ध्यान-उपासना आयोजित करो।
  33. जो लोग यह उपासना करते है उन्हें आध्यात्मिक, भौतिक दोनों सफलताये प्राप्त होती है।
  34. जो लोग उपासना के लिए एकत्रित आते है, वे संगठित होते है। इसलिए तुम नित्य ध्यान-उपासना के लिये एकत्रित आओ, यह संगठन ही तुम्हे सामूहिक सफलता देगा।
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