धर्म मार्गदर्शन

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31. प्रकृति

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ईश्वर ने तुम्हारे लिए यह सृष्टि बनायीं है, तुम ईश्वर की आराधना करो, ईश्वर की उपासना करो। तुम सदैव ईश्वर के मार्ग पर कायम रहो। यह तुम्हारा कर्तव्य है।

3. इस सृष्टि को ही प्रकृति कहते है।

4. प्रकृति नियमों से चलती है, वह नियम कभी नहीं तोडती।

5. तुम जो कुछ देखते हो, यह घर, गांव, शहर, लोग, जानवर, पंछी, पेड़, जंगल, समंदर, बादल, पर्वत, नदी, आसमान, सूर्य, चंद्र, ग्रह, तारे, यह ब्रह्माण्ड, यह प्रकृति है।

6. इन सब को एक साथ बाँधा गया है। यह सारे एकसाथ एक अदृश्य शक्ति से जोड़े गए है।

7. यह सारे अपने नियमों से चलते है, मर्यादाओं में रहते है। अपनी मर्यादा छोड़ते नहीं।

8. अगर इसमें से एक भी अपनी मर्यादा छोड़े या नियमों का उल्लंघन करे तो यह सारी सृष्टि टूटकर बिखर जायेगी। जैसे मोतियों के हार का धागा टूटने से सभी मोती बिखर जाते है वैसे यह बिखर जायेंगी।

9. अगर समंदर अपनी मर्यादा छोड़े तो सारी जमीन पानी-पानी हो जायेगी। अगर धरती अपनी कक्षा को छोड़े तो दुनिया ही नष्ट हो जायेगी। किन्तु वे कभी अपनी मर्यादा को त्यागते नहीं। मर्यादा में रहकर ही निरंतर कार्यरत है।

10. यह मर्यादा ईश्वर ने कायम की है।

11. ईश्वर ने प्रकृति को धारण किया है। अर्थात ईश्वर प्रकृति में भी है और बाहर भी, इसलिए ईश्वर को अनंत कहा जाता है।

12. इस प्रकृति में कई ऐसी शक्तियाँ है तो मनुष्य से शक्तिमान है और ईश्वर के अधीन कार्य करती है। वह शक्तियाँ देवी-देवता है।

13. इन देवी-देवताओं की आराधना करने से मनुष्य को भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है, किन्तु आध्यात्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को ईश्वर का ध्यान करना आवश्यक है।

14. ध्यान-उपासना से ही ईश्वर का परमधाम प्राप्त होता है। मोक्ष ही ईश्वर का परमधाम है। यह मोक्ष ही मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

15. जब भी तुम किसी भी देवी-देवता की उपासना करते हो, तो ॐ का उच्चारण अवश्य करो। क्योंकि सारी देवी-देवताये ईश्वर के ही अधीन कार्य करती है।

16. यह देवी-देवताये अदृश्य है और दृश्य भी है। वे प्रकट भी होती है और अप्रकट भी है।

17. ईश्वर ने यह प्रकृति तथा देवी-देवताओं को धारण किया है। अर्थात ईश्वर साकार भी है और निराकार भी है।

18. तुम्हारी कोई भी भक्ति हो उसमे ईश्वर का स्मरण होना आवश्यक है। इसलिए तुम सभी ॐ नाम का उच्चारण करो।

19. तुम जो भी कर्मकांड करते हो, तुम जो भी त्यौहार मानते हो, उस समय ॐ नाम का उच्चारण अवश्य करो।

20. ॐ का उच्चारण मनुष्य को अधोगति से बचाता है।

21. ईश्वर तुम्हारा उद्धार करते है। प्रकृति तुम्हे जन्म, अन्न, फल, जल, प्राणवायु, अग्नि, जमीन, दिन-रात, आयुष्य प्रदान करती है, तथा अंत में मृत्यु देती है।

22. तुम्हारे सारे शारीरिक सुख-दुःख प्रकृति की ही देन है।

23. ईश्वर तुम्हे कभी दुःख नहीं देते। दुःख देनेवाली प्रकृति है। किन्तु वह बेवजह दुःख नहीं देती।

24. दुनिया में जो तूफान आते है, जलजला आता है, अकाल पडता है, अपघात होते है, कई बुरी घटनाये घटती है, वह प्रकृति के नियम के अनुसार ही होते है।

25. तुम प्रकृति के नियमों से छेड-छाड मत करो। तुम वायु, अग्नि, जल की शक्तियों को नजरअंदाज मत करो, उनके नियमों से छेड़छाड़ मत करो।

26. तुम प्रकृति का सन्मान करो, उसके नियमों का पालन करो और ईश्वर की ध्यान-उपासना करो। यह ही तुम्हारे लिए योग्य मार्ग है और इसी में ही तुम्हारी भलाई है।

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