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30. असुर-देवता

1.ॐ श्री परमात्मने नमः।
2.मानव और असुर का संघर्ष प्राचीन काल से चल रहा है। प्राचीनकाल में असुरों का आतंक था, आज भी है।
3. असुर उनके देवता को एकमात्र देवता कहते है।
4. वास्तव में यह असुर-देवता एक शैतानी प्रवृत्ति है। उन्हें ऐसा देवता चाहिए जो गैरों को मारनेवाली विचारधारा के अनुकूल हो।
5. यह असुर कोई अलग मानवजाति नहीं है, वे मानव ही होते है, किन्तु उनकी सोच और प्रवृत्ति हिंसा, अधर्म की होती है, इसलिए उन्हें असुर कहा जाता है।
6. वे हिंसा में माहिर होते है, और हिंसा करने के बहाने ढूँढ़ते रहते है।
7. उनका यह कथित देवता खुद को पृथ्वी तथा स्वर्ग का मालिक समझता है। वह बड़ा अहंकारी और इर्शालू है।
8. वह दावा करता है कि वह आसमान में रहता है, वहाँ सिंहासन में बैठा है, और वहाँ से लोगों को देखता है।
9. असुरों का दावा है की वह प्रत्यक्ष धरती पर नहीं आता, बल्कि अपने सेवकों को, दूतों को भेजता है। इनके द्वारा वह लोगों को गुमराह करता है।
10.वह लोगों से कहता है कि अगर तुम उसे मानोगे तो वह स्वर्ग देगा, वहाँ सभी ऐशोआराम मिलेंगे, अप्सराये मिलेंगी, पिने के लिए शराब मिलेगी, मन चाहां खाना मिलेगा, सारे सुख मिलेंगे, इसतरह का लालच वह लोगों को देता है। वह बहोत चालाकी और मधुरता से बोलकर मानवों को फसाता है।
11. अगर नहीं मानोगे, तो वह तुमपर तुफान भेजेगा, वह तुम्हे नरक में डालेगा, वहाँ तुम्हे सताया जायेगा, आग में जलाया जायेगा, ऐसा भय वह दिखाता है।
12. वह उसके अनुयायियों को कहता है कि जो लोग उसे मानते नहीं उनकी गरदन मोड दो, उनका क़त्ल करो, उनको भगाओ, जब तक की वे शरणागत नहीं होते तब तक उन्हें सताओ।
13. वह कहता है की सारी दुनिया को उसके सामने झुकाओ, उसके शरण में लाओ।
14. वह अन्य मजहबों के देवस्थानों को तोड़ने का आदेश देता है।
15. इसतरह असुर-देवता के अनुयायी मानवों के साथ हिंसा करते है उनको मारते है, भगाते है।
16.वह उसके अनुयायियों को भी चैन से जीने नहीं देता, बल्कि सतत हिंसा करने के लिए प्रवृत्त करता रहता है। पहले गैरों को मारने के लिए कहता है, जब गैर खत्म हो जाए तो उन्हें आपस में लड़ाता है।
17. असुर-देवता यह वास्तव में शैतान है। वे शैतानी प्रवृत्ति को ही देवता समझते है तथा इसके उल्टा इस प्रवृत्ति को जो मानते नहीं उसे शैतानी कहते है। वे सबकुछ उल्टा करते रहते है। यह आध्यात्मिकता नहीं, तो मजहब के नाम पर अपराध, अनैतिकता और भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा देना है।
18. वह लोगों के पाप नष्ट करने का भी दावा करता है, पाप नष्ट करके स्वर्ग देने का आश्वासन देता है। इसतरह वह असुरों की आध्यात्मिक अधोगति करता है।
19. यह असुर-देवता वास्तव में दुराचारी और हिंसा-पसंद लोगों की प्रवृत्ति है। यह उनकी विचारधारा है, उसे वे मजहब के नाम पर फैलाते है।
20. यह असुर-देवता मानव जाति का सदैव अनिष्ट करते है।
21. देवी-देवता कभी भी गैरों को मारने के लिए नहीं कहते, वे कभी भी लोगों को यह आदेश नहीं देते की वे अश्रद्धावान को मारे।
22. असुर-देवता मनुष्य को सतत गैरों को मारने के लिए कहती है। यह साम्प्रदायिकता है। इसलिए असुरों की संख्या बढ़ना मानवों के लिए खतरा है।
23. हे मानवो, असुर तुम्हारे जैसे ही है, वे दुश्मन नहीं है, बल्कि उनकी शैतानी सोच तुम्हारी दुश्मन है. उनकी, गैरों को मारने की विचारधारा, हिंसा-पसंद मनोवृत्ति, क्रूरता, तुम्हारी दुश्मन है। जब तक वे इस प्रवृत्ति का त्याग नहीं करते, धर्म का शांतिमय मार्ग स्वीकार नहीं करते, तब तक सारी मानवजाति को इनसे खतरा है।
24. तुम असुर प्रवृत्ति से सतर्क रहो, तुम उनके प्रवृत्ति की कभी भी तारीफ न करो, उनकी तारीफ करने से उनमे जोश आता है। तथा असुर-देवता को मानकर अपनी आध्यात्मिक अधोगती मत करो, भ्रम में मत पडो। तुम सदैव सतर्क रहो।
25. तुम में से जो लोग गुमराह हुए है, भ्रमित हुए है, उन्हें सजग करो और सन्मार्ग पर ले आओ।
26. तुम अपनी शक्ति बढाओ, संगठित बनो. कानून को अपने हाथ में न लो बल्कि कानून द्वारा असुर-प्रवृत्ति को रोको, उन्हें उनकी हिंसा-पसंद प्रवृत्ति त्यागने के लिए कहो। उनको सन्मार्ग दिखाओ। सच्चे धर्म का मार्ग दिखाओ।
27. ईश्वर को मानो, ईश्वर की भक्ति करो, ईश्वर का ध्यान करो। शांति, सद्-भाव से रहो, इसी में तुम्हारा आध्यात्मिक विकास है।

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