धर्म मार्गदर्शन

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29. शांति-मार्ग

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ॐ शांति… अर्थात जहाँ ईश्वर का नाम है वहाँ शांति है।

3. ईश्वर के मार्ग में शांति है। इसलिए ईश्वर से आत्मीयता रखो, ईश्वर से प्रियता रखो।

4. कुछ लोग कहते है, “उपरवाले से डरो”।

5. किन्तु जहाँ डर है वहाँ शांति नहीं है, वहाँ खौफ है। क्या तुम खौफ को शांति कहोगे?

6. वे तुम्हे उपरवाले का डर दिखाते है और कहते है, “उपरवाले को मानो, नहीं मानोगे तो वह तुम्हे जलाएगा, नरक में डालेगा, तुम पर तूफान छोड़ेगा”। क्या यह शांति-मार्ग है? यह धमकाना, खौफ फैलाना, शांति का मार्ग नहीं, तो अशांति का मार्ग है।

7. ईश्वर के पास सभी मानवो के लिए समानता है, प्रेम है, ईश्वर के पास कोई भेदभाव नहीं है, ईश्वर को सभी प्रिय है, भले ही तुम ईश्वर को मानो या न मानो। ईश्वर के पास कोई नफ़रत नहीं है।

8. जो लोग ईश्वर के श्राप लगने का दावा करते है, वास्तव में वे तुम्हे भटकाने की कोशिश करते है, गलत धारना फैलाते है। तुम याद रखो की ईश्वर शांतस्वरुप एवं प्रेमस्वरूप है। वे श्राप नहीं देते।

9. तुम ईश्वर से डरो नहीं, बल्कि स्नेह रखो। तुम ईश्वर भक्ति और ध्यान में निरंतर रहो। इधर उधर भटको मत। ईश्वर पर दृढ़-श्रद्धा रखो। अपने ह्रदय को ईश्वर-प्रेम से भरो।

10. मानवों से क्रोध करना, भेदभाव दिखाना, उन्हें खौफ दिखाना, यह ईश्वर का लक्षण नहीं है। यह असुर-देवता का लक्षण है।

11. असुर-देवता लोगों को प्रिय और अप्रिय में बाँटते है, अपने और गैरों में बाँटते है। वे अप्रिय/गैरों को मारने के लिए कहते है। ऐसे असुर-देवता के अनुयायियों को कभी भी शांति नसीब नहीं होती। वे हमेशा अशांति से त्रस्त रहते है।

12. गैरों को मारना, उनके बारे में नफ़रत फैलाना यह अशांति का बिज है। यह जहर की खेती करने जैसा है। यह शांति-मार्ग कदापि नहीं।

13. ईश्वर के लिए सभी प्रिय है, सभी समान है।

14. ईश्वर मानवता को प्रिय-अप्रिय, अपने-गैर में बाँटते नहीं। वे सबको समदृष्टि से देखते है।

15. असुर-देवता इर्शालू होता है। वह चाहता है की तुम सभी उसके शरण में आओ, और तौबा करो। नहीं तो वह तुम्हे मारेंगा। ऐसे असुर-देवता की श्रद्धा कभी शांति-मार्ग नहीं हो सकती।

16. कुछ लोग कहते है उपरवाला गुनाहों को माफ़ करता है। क्या वह गुनाहगारों का देवता है? अगर सभी सरकारे गुनाहगारों को माफ़ करे, तो सभी लोग गुनाह करते रहेंगे। सारा समाज आपराधिक बनेगा। इसीतरह अगर कोई देवता गुनाह को माफ़ करे, तो उसके अनुयायी बार-बार गुनाह करेंगे। यह समाज में आपराधिक गतिविधियों को मान्यता देने का एक तरीका है। ऐसे समाज में शांति रहना असंभव है।

17. ईश्वर कोई गुनाह का देवता नहीं है, वह गुनाह माफ़ नहीं करता। तुम जो कर्म करते हो उसके फल समय आने पर तुम्हे भुगतने ही है। क्योंकि ईश्वर न्याय करनेवाला है और जहाँ न्याय है वहाँ शांति है।

18. कुछ लोग तुम्हे कहेंगे की उनका देवता पाप को माफ़ करता है। उनसे कहो, ‘क्या वह पापियों का देवता है?’ याद रखो जहाँ पाप है वहाँ शांति नहीं है। ईश्वर कभी तुम्हारे पापों को माफ़ नहीं करता, तुम्हे तुम्हारे पापों का बुरा फल समय आनेपर अवश्य मिलेगा। इसलिए तुम अच्छे कर्म करो।

19. तुम ईश्वर की ध्यान-उपासना करो। जहाँ ध्यान है, वहाँ शांति है। जहाँ ध्यान नहीं, वहाँ शांति नहीं।

20. उपासना का मतलब केवल कवायद नहीं है। क्या तुम उपासना के नाम पर कवायद करोगे? कवायद में शांति नहीं है। जहाँ ध्यान है, वहाँ ही शांति है।

21. ईश्वर की उपासना में ध्यान होना आवश्यक है, तभी वह शांति-मार्ग है, क्योकि ध्यान से ही आत्मा में शांति का अनुभव होता है।

22. मन और आत्मा में अगर शांति नहीं तो तुम्हारा मार्ग शांति-मार्ग नहीं।

23. शांति-मार्ग के लिए मन और आत्मा में शांति होना आवश्यक है। इसलिए तुम रोज ध्यान-उपासना करो। और शांति-मार्ग पर कायम रहो।

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