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27. स्वर्ग-नरक

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ईश्वर ने यह दुनिया बनायीं है।

3. तुम ईश्वर की उपासना करो।

4. कुछ लोग कहते है की ईश्वर ने स्वर्ग, नरक बनाये है, वे कहते है की अच्छे कर्म करोगे तो स्वर्ग मिलेगा, बुरे कर्म करोगे तो नरक मिलेगा। वे कहते है की स्वर्ग में अप्सराये है, मनचाहा भोजन है, पिने के लिए शराब है, बाग बगीचे है, सभी इन्द्रियों को तृप्त करने की व्यवस्था स्वर्ग में है। तथा नरक में यातनाये है, आग है, उसमे जलाया जाता है, हाथ पैर काटे जाते है, वहा सभी प्रकार की यातनाये दी जाती है।

5. वे कहते है की ईश्वर से डरोगे तो तुम्हे स्वर्ग मिलेगा, नहीं तो नरक मिलेगा। लेकिन यह भ्रम है।

6. स्वर्ग में जो सुख बताये है वे सभी सूख धनवान लोग इसी धरती पर प्राप्त करते है। उनके लिए बड़े बड़े रिसोर्ट है, होटेल्स है, ऐशो आराम की सारी चीजे है।

7. नरक में जो यातनाये बताई गयी है वे सभी यातनाये कुछ लोग धरती पर ही अनुभव करते है। आतंकवाद, दहशतवाद, भयंकर बिमारिया, आपत्तिया, यह लोगों के जीवन को नरक बनाते है।

8. जो लोग ईश्वर के नाम से स्वर्ग का लालच दिखाते है, वास्तव में वे ईश्वर को यह कथित सुख-सुविधा देनेवाला व्यापारी समझते है।

9. जो लोग ईश्वर के नाम से नरक का भय दिखाते है, वे ईश्वर को दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी ही साबित करते है।

10. ईश्वर को स्वर्ग के सुख तथा नरक के दुःख से कुछ लेना देना नहीं है। स्वर्ग नरक यह काल्पनिक है। तुम इस चक्कर में मत पडो।

11. स्वर्ग-नरक धरती पर ही है। स्वर्ग के सारे सुख लोग धरती पर ही अनुभव करते है। तथा नरक के सारे दुःख लोग धरती पर ही अनुभव करते है।

12. जो लोग विषयासक्त नहीं होते, वास्तव में वे ही मन की आतंरिक शांति के रूप में स्वर्ग का अनुभव करते है।

13. जो लोग अत्यधिक विषयासक्त होते है, वे इस के दुष्परिणामों से बच नहीं सकते, और दुःख-दर्द के रूप में नरक का अनुभव करते है।

14. कुछ बुरे कर्म करनेवाले सुखी दिखते है। लेकिन अंदर की बात कोई नहीं जानता। वह आदमी भले ही ऊपर से सुखी लगता हो, अंदर से वह भारी दुखी और नरक यातनाये भुगतता रहता है।

15. इसीलिए याद रखो बुरे काम का बुरा नतीजा, अच्छे काम का अच्छा नतीजा। तुम हमेशा अच्छे मार्ग का अनुसरण करो, अच्छे कर्म करो।

16. इस धरती को स्वर्ग में बदलो, नरक बनने से रोको।

17. स्वर्ग का अर्थ ऐशोआराम नहीं है, बल्कि ईश्वर का परमधाम है। नरक का अर्थ भी सताने की जगह नहीं है, बल्कि जीवन की अधोगति है।

18. सत्कर्म करनेवालों को सुख यानि स्वर्ग है और बुरे कर्म करनेवालों को दुःख यानि नरक है।

19. अगर स्वर्ग-नरक आसमान में बनाया होता तो उसकी जनसंख्या अबतक बहोत बढ़ी होती, अप्सराओंकी और जल्लादों की संख्या कम पड़ी होती।

20. तुम्हारे जो कर्मफल है वे तुम्हे भुगतने ही है। और धरती पर ही भुगतने है।

21. शास्त्र कहते है की यह कर्मफल अगले जनम तक भी पीछा नहीं छोडते। वे अगले जनम में भी भुगतने पड सकते है।

22. तुम्हारा लक्ष्य स्वर्ग-नरक नहीं है, मोक्ष है। इसलिए स्वर्ग प्राप्ति का लालच और नरक का भय छोड दो और मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करो।

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