धर्म मार्गदर्शन

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25. मूर्ति-पूजा

1.ॐ श्री परमात्मने नमः ।

2. ईश्वर का नाम ॐ है।

3. वह निराकार है, वह अदृश्य है, अव्यक्त है।

4. अव्यक्त का चिंतन करना, उसपर चित्त एकाग्र करना कुछ लोगों के लिए कठिन कार्य है।

5. देह की इन्द्रियानुभवों में लिप्त मानवों को अतीन्द्रिय अव्यक्त का चिंतन करना कष्टकारक है।

6. अदृश्य ईश्वर का स्वरुप दर्शाना कुछ साधारण मानव के लिए असंभव है। इसलिए ईश्वर के दृश्य स्वरुप अर्थात साकारस्वरुप अर्थात मूर्तिपूजा का अविष्कार हुआ है।

7. निराकार को देखना संभव नहीं है। मनुष्य का शरीर पंचमहाभूतों से बना है, अर्थात वह भौतिक नियमों से बंधे है। जब तक मनुष्य भौतिक नियमों से बंधा है, तब तक वह निराकार को नहीं देख सकते।

8. इसी के चलते हिंदूसमाज में दो प्रकार की उपासना पद्धतिया प्रचलित है- वह है निराकार और साकार।

9. ईश्वर के साकार स्वरुप को देखा जा सकता है। भगवद्गीता ने कहा है- ईश्वर के साकार स्वरुप को देखने के लिए दिव्यचक्षु की आवश्यकता है। अर्जुन को दिव्यचक्षु प्राप्त होने के बाद ही, वह ईश्वर के विविध रूपों को देख सका।

10. ईश्वर का पूजन करना यह अद्वितीय आध्यात्मिक नैतिकता है। किन्तु निराकार का पूजन नहीं किया जा सकता। इसलिए साकार अर्थात मूर्ति-स्वरुप का पूजन किया जाता है। यह ईश्वर के प्रति विश्वास और आदर की एक पद्धति है। पूजा का अर्थ है सन्मान और आदर।

11. मूर्ति यह ईश्वर का साकार दर्शन है। मूर्तिपूजा यह मूर्ति की पूजा नहीं है, यह ईश्वर की पूजा है।

12. ईश्वर की प्रशंसा करना, स्तुति करना यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि ईश्वर को स्तुति/प्रशंसा नहीं चाहिए। बल्कि ईश्वर का ध्यान करना अथवा पूजन करना यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रत्येक मानव का कर्तव्यकर्म है।

13. निराकार की उपासना एक ही है वह है ध्यान-उपासना।

14. साकार की उपासना अनेक है। वह है मूर्तिपूजा, फोटो/प्रतिमा, पत्थर, देवता का मंदिर या घर का सन्मान करना ई.। जिन्हें निराकार उपासना अच्छी लगती है वे निराकार उपासना करें तथा जिसे मूर्तिपूजा अच्छी लगती वे वे मूर्तिपूजा करें। धर्म में मूर्तिपूजा करना बंधनकारक नहीं है ।

15. किसी भी पंथ, उपपंथ, रिलीजन, मजहब में अगर कोई किसी मूर्ति, फोटो/प्रतिमा, पत्थर, देवता-घर इत्यादी पर श्रद्धाभाव रखते हुए उसकी दिशा में खड़ा होकर प्रार्थना करता है, भले ही वह उसका पूजन करता न हो, वह मूर्तिपूजा ही है। सभी लोग साकार का आधार लेते ही है ।

16. मुर्तिया रखना, प्रतिमा रखना, पत्थर को चूमना, प्रदक्षिणा मारना यह साकार उपासना ही है।

17. कोई भी श्रध्दा में दृश्य वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता है तो वह साकार उपासना ही है।

18. कुछ लोग ऐसे होते है जो मूर्तिपूजा नहीं करने का दावा करते है, लेकिन अगर तुम उनके श्रध्दा स्थानों को करीब से देखोगे तो तुम्हे दिखाई देगा की उनका भी देवता निराकार नहीं है।

19. मूर्तिपूजा के विरोध का दुष्परिणाम यह है की ऐसे लोग मरे हुए लोगों की, मुर्दों की इबादत करते है, यह महाभयंकर है, यह अघोरी तरीका है, ये तामसिक तरीका है। इसमें अधोगति के सिवा और कुछ नहीं। इस तरीके में जहा इबादत की जाती है वह मांस, हड्डी, मिटटी और सीमेंट का ढेर होता है, क्योंकि मरनेवाले की आत्मा तो कब की निकल चुकी होती है और अपने कर्म के अनुसार गति प्राप्त कर लेती है। इसे पड़ी-मूर्ति पूजा भी कहा जाता है।

20. इसतरह के अघोरी तरीके से दूर रहो।

21. ईश्वर के साकार उपासना में मूर्तिपूजा ही सबसे पवित्र है, अच्छी है।

22. इसलिए तुम साकार का विरोध मत करो, बल्कि साकार और निराकार उपासना में समन्वय प्रस्थापित करो।

23. जहा मूर्तिपूजा नष्ट होती है, वहां विचारधारा पनपती है।

24. यह मुर्तिविरोधी विचारधारा बडी असहिष्णु होती है, सांप्रदायिक होती है, समाज का विनाश करनेवाली होती है।  इन्होने कई कॉमे, बिरादरिया, जातिया नष्ट की है।

25. मूर्तिपूजक लोग विविधतावादी होते है, अनेक्तावादी होते है। वे अनेकता में एकता को देखते है। बल्कि मूर्तिपूजा के विरोधियों में केवल सांप्रदायिक जूनून होता है।

26. मूर्तिपूजा मनुष्य में आध्यात्मिकता फ़ैलाने का आसान तरीका है। इसमें लोग आनंद महसूस करते है। इसलिए तुम ईश्वर की निराकार और साकार उपासना में समन्वय रखो।

27. जो लोगोंको निराकार उपासना प्रिय है, वे लोग ध्यानालय का निर्माण करें और वहा रोज ध्यान-उपासना को आयोजित करें।

28. ईश्वर सब देख रहा है। वह सर्वज्ञ है।

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