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24. पुण्य-पाप

1- ॐ श्री परमात्मने नमः
2- अ …. उ …. म ….
3- ईश्वर परमदयालु परमात्मा है। आप सभी पर ईश्वर की कृपा है।
4- यह पुस्तक तुम्हे योग्य मार्ग का दर्शन कराती है।
5- निःसंदेह यह पुस्तक तुम्हे सत्यमार्ग दिखाती है और अधोगति से बचाती है।
6- पाप अर्थात बुरे कर्म और पुण्य अर्थात अच्छे कर्म।
7- आपके पाप को ईश्वर कभी माफ़ नहीं करता। क्या ईश्वर पापियों का देवता है? जो पाप को माफ़ करेगा? बिलकुल नहीं।
8- मनुष्य को हमेशा पाप आकर्षित करता है, वह जानबूझकर भी पाप करता रहता है। याद रखो पाप को माफी नहीं है, तुम्हे पाप के भोग भोगने ही है।
9- अगर ईश्वर पाप को माफ़ करता तो कोई व्यक्ति दु:खी न होता।
10- जो लोग कहते है की तुम्हारे पापों को उनकी देवता माफ़ करता है, और तुम्हारा उद्धार करता है, वे झूट बोलते है, तुम्हे बरगलाते है तथा वे तुम्हे अधोगति के रास्ते पर ले जाते है।
11- उनसे कहो, “अगर तुम्हारा देवता पाप को माफ़ करता है तो तुम क्यों दु:ख भोगते हो”
12- हर व्यक्ति को उसके पापकर्मों के फल भुगतने ही है, यह प्रकृति का नियम है। अगर इससे तुम बचना चाहते हो तो तुम्हे पुण्य का संचय करना आवश्यक है।
13- पुण्य के संचय से तुम्हारे पापकर्मों के फलों का तुम धेर्य से सामना कर सकोगे, पाप के भोग से सही सलामत बच निकलोगे।
14- इसलिए पुण्य का संचय करो और अपना उद्धार करो। तूम ही तुम्हारे उद्धारकर्ता हो।
15- ईश्वर का ध्यान ही पुण्यसंचय का प्रथम उपाय है। दूसरा उपाय है दानधर्म। तीसरा उपाय है स्वच्छ अन्तःकरण। चौथा उपाय है सद्कर्म।
16- तम्हारा मोक्ष तुम्हारे कर्म से निर्धारित होता है। और तुम्हारा पुण्यसंचय ही तुम्हे ईश्वर का परमधाम प्राप्त करने में सहायक है।
17- तुम पूजापाठ, आरती, कीर्तन, भजन करते हो, ईश्वर की स्तुति करते हो, इससे तुम्हे पुण्य प्राप्त होता है।
18- इससे भी दुगना पुण्य तुम्हे ईश्वर का सतत नामस्मरण करने से मिलता है।
19- इस नामस्मरण से भी दुगना पुण्य तुम्हे ध्यानउपासना से मिलता है।
20- ध्यान द्वारा ही ईश्वर का अनुभव अंतरात्मा में होता है।
21- ध्यानउपासना ही तुम्हारी प्रमुख उपासना है।
22- तुम किसी भी देवता की उपासना करो, उससे दस गुना जादा पुण्य तुम्हे ध्यानउपासना करने से मिलता है।
23- अगर ध्यानउपासना द्वारा जादा पुण्य अर्जित करना चाहते हो तो उसे सामुदायिकता से करो। जितने भी लोग साथ मिलकर समूह ध्यानउपासना करेंगे उनकी संख्या के गुनाकर में तुम्हे पुण्य प्राप्त होता है।
24- ध्यानउपासना करो, दानधर्म करो, अपना देश, धर्म, समाज, परिवार के प्रति कर्त्यव्यकर्म करो, यह पुण्य प्राप्त करने के उपाय है।
25- तुम जादा से जादा पाप कर्म करने से अपनेआप को बचाओ। क्योंकी वे तुम्हारे लिए दुखद है।
26- स्त्री-पुरुष पर अन्याय, अत्याचार करना पाप है।
27- किसी का हक छीनना पाप है।
28- असुर प्रवृति का अनुकरण करना पाप है।
29. अनैतिकता करना पाप है।
30- देश,धर्म एवं समाज के खिलाफ षडयंत्र करना पाप है।
31. पाप कई प्रकार के है, पापों का अंत नहीं है,किन्तु तुम पुण्यसंचय करते रहो।
32. पुण्य यह आपके सद्कर्मों का संचित है।
33. पुण्य आपके आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।
34. पुण्य से ही आपको मानसिक सुखशांति मिलती है।
35. पुण्य से आपको ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। जो भी तुम पुण्य प्राप्त करोगे उसका लाभ ईश्वर तुम्हे अवश्य देता है।

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