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23. असुर

1. ॐ श्री परमात्मने नमः

2. अ.…उ.… म.……

3. ईश्वर परम दयालु परमात्मा है। ईश्वर की आप सभी पर कृपा है।

4. यह सारी सृष्टि ईश्वर की है। ईश्वर ही इस सृष्टि का निर्माणकर्ता है।

5. किन्तु असुर और राक्षस इस धरती पर कब्ज़ा करना चाहते है। अत्याचार और अधर्म का राज स्थापन करना चाहते है।

6. राक्षस और असुर तुम्हारे मंदिर तोड़ते है, तुम्हारे देवताओं का अपमान करते है। तुमको धर्म का अनुकरण करने से रोकते है।

7. वे तुम्हारे साथ हिंसा करते है। वे समस्त मानव जाती को नष्ट करना चाहते है। और पूरी दुनिया को उनके जैसा बनाना चाहते है।

8. उनके भी कथित देवता होते है, जो उन्हें यह सब करने के लिए कहते है, ऐसा वे दावा करते है।

9. उनका देवता कहता है, ‘समस्त मानव जाती को नष्ट करो, मैंने कई मानव वंश नष्ट किये है’।

10.असुर कहते है, ‘हमारे देवता को मानो, हमारे जैसा बनो।’ यह उनके विचार है। यह उनका अहंकार है, उनका अज्ञान है। तुम उनके विचारों को मानने के लिए बाध्य नहीं हो। तुम ईश्वर के उपासक बनो।

11.राक्षस और असुरों के पास कोई भी नीतिमत्ता नहीं होती, उनका आचरण हमेशा संदेहपूर्ण होता है।

12.वे तुमसे हमेशा झूट बोलते है ताकि तुम गफलत में रहो। लेकिन ईश्वर सब देख रहा है, वह सर्वज्ञ है।

13.तुम हमेशा उनसे सतर्क रहो। अपनी जानमाल की रक्षा करो।

14.तुम उनके जैसा कभी मत बनो क्योंकि उनका मार्ग अधोगति का है। उनके मार्ग में ईश्वर का परमधाम नहीं है।

15.वो कहते है कि उनको ही स्वर्ग मिलेगा, जबकि वे धरती पर ही शांति से नहीं रह सकते, तो उन्हें स्वर्ग कैसा? वे सरकशी में लगे हुये है।

16.तुम उनका न सुनो। याद रखो, जो ईश्वर की उपासना करते है, सद्कर्म करते है, उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं। असुर कुछ भी कहे उनका मार्ग अधोगति का है।

17.असुर कभी भी तुम्हारा समर्थन नहीं करेंगे, वे तुम्हारा घात ही करेंगे, जब तक की तुम उनके जैसे न बन जाओ। जो उनके जैसे बने है उन्हे भी कहा सुख-शांति है, उनके लिए भी बड़ी कठिनाइया है, वे अशांति से भरे है, उनके जीवन में अधोगति के सिवा और कुछ नहीं है। वे अज्ञान में भटक रहे है। उनमे से कुछ तो मुक्ति के लिए तरस रहे है।

18.असुर तुम्हे बहकते है, तुम्हे गुमराह करते है।

19.वे कहते है कि उनका देवता ही सही है, लेकिन यह उनके ख़यालात है। तुम उनके झांसे में मत पडो, हमेशा सतर्क रहो।

20.तुम्हारा देवता और असुर देवता में बहोत बड़ा अंतर है। असुर देवता भयंकर क्रोधित होता है, लोगों को लूटने मारने को कहता है। और उस लूट में अपना हिस्सा भी मांगता है।

21.ईश्वर तुम्हे हमेशा सही मार्गदर्शन करते है, किन्तु असुर देवता तुम्हे गलत मार्ग दिखता है। इसलिए सावध रहो।

22.यह असुर देवताये बड़ी ईर्षालु होती है, वे तुम्हारी देवताओं के साथ नफरत करती है, और उन्हें नष्ट करने के लिए कहती है। तुम उनसे न डरो। ईश्वर की उपासना करो, ध्यानउपासना के लिए एकत्रित आओ। जैसे ही तुम ध्यानउपासना के लिए एकत्रित आओगे, कायम करोगे, असुर और राक्षस तुमसे दूर भागेंगे। इससे तुम्हे शांति प्राप्त होगी।

23.शांति प्राप्त करने के लिए तुम ध्यानउपासना करो, दान धर्म करो, और फलप्राप्ति के इच्छा के बिना कर्म करते रहो । इससे अच्छा कोई मार्ग नहीं।

24.हे मानवो, तुम ईश्वर की उपासना करो, वही तो है जिसने तुम्हे बनाया है।

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