धर्म मार्गदर्शन

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21. ध्यानउपासना

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. यह सृष्टि जो आप देख रहे है, वह ईश्वर की बनायीं हुई है। और तुम्हारा यह कर्तव्य-कर्म है की तुम ईश्वर की उपासना करो।

3. जिसने तुम्हे बनाया है, उस ईश्वर की उपासना करो।

4. ईश्वर की सर्वश्रेष्ट उपासना ध्यान-उपासना है। ध्यान-उपासना से ही ईश्वर की अनुभूति होती है।

5. ईश्वर की कृपा से ही यहाँ ध्यान-उपासना को प्रस्तुत किया है।

6. ध्यान उपासना यह निराकार ईश्वर की एकमात्र उपासना है। अन्य कोई भी उपासना निराकार उपासना नहीं है।

7. नित्य ध्यान-उपासना से ईश्वर की तुम पर कृपा दृष्टि बनी रहेगी। यह उपासना ही वास्तव में धर्म-प्रार्थना है। तुम इस उपासना को, प्रार्थना को नित्य आयोजित करो।

8. ध्यान के कई अर्थ और प्रकार है। तपस्वियों के लिए ध्यान-तप है और सामान्य लोगों के लिये ध्यान-उपासना है।

9. ध्यान का अर्थ है ईश्वर का चिंतन-मनन करना। उपासना का अर्थ है ईश्वर के पास/ सामने बैठना। ध्यान-उपासना का अर्थ है ईश्वर का चिंतन-मनन करते हुए ईश्वर के पास/सामने बैठना।

10. यह ध्यान-उपासना इस प्रकार है:-

स्थिति 1- नमस्कार- खड़े होकर हाथ जोड़कर गर्दन झुकाकर कहें- ॐ श्री परमात्मने नमः।

स्थिति 2- समर्पण – कमर में झुककर जमीन को हाथ लगाकर कहें- ॐ तत् सत् (तिन बार कहें)

स्थिति 3- शान्ति मन्त्र- खड़े होकर हाथ जोड़कर कहे-

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः

पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: ।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:

सर्वं शान्ति:, शान्तिदेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि ।।

ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ।।

स्थिति 4-  ध्यान –ध्यान की स्थिति में बैठे। और कहे-

          ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो न: प्रचोदयात।
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्य ते।
ॐ सर्वेत्र सुखिन सन्तु सर्वेसन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्चन्तु मा कश्चिद दू:ख माप्नुयात।
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।
ॐ ओंकार: सर्व मंत्रणा मुत्तमा: परिकीर्तित:।
ओंकारें प्लवैनैव संसाराब्धि तरिस्यसी।
ॐ ओंकार बिंदु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्तियोगिन:।
कामदं मोक्षदं चैव ओंकाराय नमोनमः।
ॐ ओंकार प्रभवो देवा ओंकार प्रभवो स्वर:।
ओंकार प्रभव: सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम।
ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरण।
य: प्रयाति त्यजन्देहं सं याति परमां गतिम्।
ॐ असतो मा सद् गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृतोर्मा अमृतमगमय।

स्थिति 5- इति समर्पण- जमीन को माथा लगाकर कहे-

समानी व आकृति: समाना हृदयानी व:

समानमस्तु वो मन: यथा व: सुसहासति।

ॐ शांति: ॐ शांति: ॐ शांति:।।

स्थिति 6- नमस्कार- जमीन से माथा उठाकर, हाथ जोड़कर कहें- ॐ तत् सत् (तिन बार कहें)

स्थिति 7- प्रणाम – खड़े होकर नमस्कार करे और कहे- ईश्वर श्रेष्ठ है (तिन बार कहें), एक कदम पीछे आकर अपना स्थान छोड़े। इस तरह ध्यान-उपासना करें।

11. जो लोग उपासना के लिए बाद में आयेंगे वे भी इसी क्रम में ध्यान-उपासना करें। ध्यान-उपासना में नियमितता और अनुशासन कायम करें।

12. यह उपासना केवल दस मिनिट की है इसमें समय नष्ट नहीं होता, पैसा खर्च नहीं होता। इसमें तुम्हारे आत्मा पर कोई बोझ नहीं है, तुम पर कोई जबरदस्ती नहीं है। बल्कि यह तुम्हारा कर्तव्य-कर्म है।

13. ध्यान-उपासना करने से तुम्हारा पुण्य-संचय होगा और तुम्हे ईश्वर का परमधाम प्राप्त होगा।

14. जो लोग अपना कर्तव्य समझ कर ध्यान-उपासना करते है वे सात्विक है। जो लोग स्वार्थ और परमार्थ दोनों के लिए यह उपासना करते है वे राजस् है। जो लोग केवल मतलब के लिए यह उपासना करते है वे तामसिक है। तुम सात्विक बनो।

15. इस ध्यान-उपासना को ध्यानालय में अथवा मंदिर में आयोजित करें। सभी लोग एकत्रित आकर इसे सामूहिकता से करें। एक विशिष्ट समय पर आयोजित करें। इसका कालावधि और समय निश्चित हो।

16. सप्ताह में एकबार इस उपासना के बाद लोगों को संबोधित करे, इससे लोगों को मार्गदर्शन प्राप्त होगा। वे जागृत रहेंगे। यह संबोधन दस मिनिट से जादा न हो।

17. निरंतर अभ्यास से तुम इसमें उच्चतम अनुभव प्राप्त करोगे।

18. यह व्यवस्था प्रत्येक मंदिर तथा ध्यानालय में कायम करो। यह धर्म की सबसे बड़ी सेवा है।

19. इस सेवा को तुम निरंतर करो, इससे धर्म को गौरव प्राप्त होगा।

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