धर्म मार्गदर्शन

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18. सन्यासाश्रम

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ईश्वर न्यायकर्ता और नितिकर्ता है। वह परमदयालु परमात्मा है।

3. ईश्वर ने तुम्हारे लिए यह सृष्टि निर्माण की है।

4. तुम्हारा यह कर्तव्य है कि तुम ईश्वर का ध्यान करो और ईश्वर के बताये मार्ग पर चलो।

5. जीवन के चार जीवन पद्धतियों में एक पद्धति है सन्यासाश्रम।

6. जीवन में विद्या प्राप्त करने का जो कालावधि है, अर्थात ब्रह्मचर्य के बाद मनुष्य के सामने दो पर्याय होते है एक गृहस्थाश्रम और दूसरा सन्यासाश्रम।

7. सन्यासाश्रम यह अत्यंत कठिन जीवनपद्धति है। इसमें आजीवन अविवाहित रहकर धर्म का कार्य करना होता है।

8. सन्यासी को आत्मा के मोक्ष के साथ जगत के कल्याण के लिए कार्य करना होता है।

9. केवल अविवाहित होने से मोक्ष नहीं मिलता, मोक्ष तो विवाहित लोगों को भी मिलता है। सन्यासी के लिए धर्म तथा समाज कल्याण का कार्य करना महत्वपूर्ण है।

10. हर व्यक्ति पर समाज का ऋण रहता है, जब तक यह ऋण को अदा नहीं किया जाता, तब तक मोक्ष नहीं। इस ऋण के अदायगी का एक ही मार्ग है समाजसेवा। इसलिए प्रत्येक सन्यासी समाजसेवा से जुड़े।

11. मठ, मंदिरों में रहना केवल स्त्रिविरहित गृहस्थाश्रम है, इसलिए सन्यासी को समाज में सक्रीय हो।

12. सन्यासी वही बन सकता है जिसकी ईश्वर पर दृढ़ आस्था है, जिसके मन में दुनिया की सभी महिलाओं के बारे में माता-भगिनी का भाव उत्पन्न होता है, जिसके मन में संसार का न्यासी अर्थात विश्वस्त का भाव है, जो सभी मनुष्य/प्राणी के बारे में सदभाव रखता है।

13. सन्यासी गलत भाषा न बोले, जो चीजे वासना को दर्शाती है उनसे दूर रहे, अपने चरित्र को उभारे।

14. सन्यासी अहंकार विरहित रहे। रस्ते से चलते वक्त अपनी आँखे झुकाकर चले।

15. अपनी जरूरते कम रखे, सादगी से रहे, जिस संस्था से जुड़े है वहाँ अनुशासन का पालन करें।

16. संपन्नता से दूर रहे, आलस्य को शरीर से निकल दें।

17. अपने मन को व्यस्त रखे, सतत अध्यात्मिक किताबे पढ़ें।

18. जो भी कार्य हो उसमे आनंद को महसूस करें।

19. धर्म के लिए कार्य करते रहे, ध्यानालयों का निर्माण करें और लोगों को ध्यान-उपासना सिखाए, उनको एकत्रीत करें।

20. अपने स्वास्थ के लिए प्राणायाम, योग करें। चलते रहे, खेलों में हिस्सा लें।

21. अन्तर्बाह्य स्वच्छता रखें, नृत्य न करें, फ़िल्मी गाने न सुने।

22. चरित्र यह ज्ञान से शक्तिशाली है। चरित्र निर्माण यह सन्यासी जीवन में अत्यंत आवश्यक है।

23. ब्रह्मचर्य में संचित वीर्य ओजशक्ति में परिवर्तित होता है, इससे सन्यासी के चेहरे पर शांति तथा तेज उत्पन्न होता है।

24. दीर्घायुष्य के लिए ब्रह्मचर्य, शुद्ध पानी, अच्छा आहार, पवित्रता, शांति, आनंदित तथा आशावादी मन आवश्यक है।

25. मन की शांति, निर्भयता, दृढ़ इच्छाशक्ति, अच्छी स्मरणशक्ति तथा एकाग्रता यह ब्रह्मचर्य के फल है।

26. सन्यासी अर्धनग्न नहीं रहता, वह पुरे शरीर पर कपडे पहनता है, जैसे स्वामी विवेकानंद पहनते थे। प्रत्येक सन्यासी स्वामी विवेकानंद का अनुकरण करें।

27. भगवे वस्त्र वही पहन सकता है जिसने ग्यारह वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन किया हो तथा जिसे किसी प्रतिष्टित धर्मसंस्था द्वारा सन्यासी की उपाधि प्राप्त हो। अन्यथा भगवे वस्त्र पहनना अध्यात्मिक अपराध है।

28. सन्यासी अपनी व्यक्तिगत पुजा पद्धति न रखे। वह निराकार ईश्वर ॐ पर विश्वास रखे, ध्यान-उपासना करें।

29. कोई भी सन्यासी अपने आपको ईश्वर के बराबर न समझे। स्वामी, योगी, संत, सतगुरु जैसी उपाधिया लगाना ठीक है, किन्तु ईश्वर के साथ बराबरी करना, अपने आपको ईश्वर बनाना, अपनी ही पूजा, आरती बनवाना यह धर्म का अपराध है। इसतरह के कुप्रथा से वे अपने आपको बचाये।

30. प्राचीन काल में ऋषि मुनि लोगों को भाषा, व्याकरण, समाजशास्त्र, राजनीती, धर्मशास्त्र तथा धनुर्विद्या ई. सिखाते थे। उनके गुरुकुल तथा छात्रावास थे। उसी तरह प्रत्येक सन्यासी कार्य करें।

31. वे स्वयम प्रशिक्षित हो और दूसरों को भी प्रशिक्षित करें।

32. वे ध्यान-उपासना, लोकसंगठन, लोकसंग्रह के कार्य करें।

33. अहंकार का त्याग करना ही सन्यास है।

34. प्रत्येक सन्यासी आत्मरत होकर, किसी की भी अपेक्षा न करें, इस संसार में धर्म तथा विद्या की वृद्धि करने के लिए उपदेश करते हुए भ्रमण करें।

35. स्वच्छ रहें, स्वच्छ कपडे पहने। संयमात्मा होकर, सभी मानव तथा प्राणियों को पीड़ा न देते हुए संचार करें।

36. लोगों को योग्य मार्ग पर लाने के लिए अनासक्त होकर कर्म करें।

37. सभी की ओर समदृष्टि से देखे।

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