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17. वानप्रस्थ

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ईश्वर न्यायकर्ता और नितिकर्ता है। वह परमदयालु परमात्मा है।

3. ईश्वर ने तुम्हारे लिए यह सृष्टि निर्माण की है।

4. तुम्हारा यह कर्तव्य है कि तुम ईश्वर का ध्यान करो और ईश्वर के बताये मार्ग पर चलो।

5. जीवन का तीसरा मार्ग है वानप्रस्थाश्रम।

6. वानप्रस्थ का अर्थ है विरक्त-जीवन। यह गृहस्थाश्रमी का सन्यास जीवन ही है।

7. विरक्त-जीवन जीने के लिए वन में प्रस्थान करने को वानप्रस्थ कहा जाता है, किन्तु आज सबके पास वन या खेती न होने के कारण विरक्त-जीवन के लिए वनों की तरफ प्रस्थान करना सबको संभव नहीं है। ईश्वर सब जानता है, ईश्वर का आपकी आत्मा पर कोई बोझ नहीं है।

8. इसलिए आपको वानप्रस्थ के लिए घर-संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि धीरे धीरे विरक्ति को अपनाना है, आसक्ति को दूर करना है। यह आपके मन:शांति तथा मोक्ष के लिए आवश्यक है।

9. जब व्यक्ति की उम्र साठ साल की हो जाए तो वह इस जीवन में प्रवेश करता है, अर्थात जब वह नानानानी या दादादादी बन जाए तो वह विरक्त-जीवन को अपनाये।

10. इसमें अपना कारोबार/व्यवसाय अपने बच्चों के हाथ में सौपे और केवल मार्गदर्शक की भूमिका निभाये। बच्चों को केवल मार्गदर्शन करें, आदेश न दें। उनके जीवन में हस्तक्षेप न करें।

11. अपने उर्वरित जीवन को समाजसेवा, आध्यात्मिक अभ्यास तथा ईश्वर का ध्यान करने में लगाये।

12. अपना जीवन सादगी से जिये।

13. धीरे धीरे अपने मन से आसक्ति को हटाने का प्रयास करें।

14. आसक्ति-विरहित जीवन जीने का प्रयास करे, प्रसन्नता और ईश्वर के परमधाम प्राप्त करने हेतु ध्यान-उपासना करें।

15. अपने पौत्रों के साथ समय बिताये। ईश्वर का नामस्मरण करें।

16. आसक्ति-विरहित जीवन और ईश्वर का ध्यान यह तुम्हारे मोक्ष के लिए आवश्यक है।

17. तीर्थयात्रा करें, भारतभर प्रवास करें, आनंद से रहे।

18. हरसंभव दानधर्म करें। यह तुम्हारे लिए वानप्रस्थ है। धर्म का मार्गदर्शन है।

19. नि:संशय इसतरह वानप्रस्थ के आचरण से तुम्हे ईश्वर का परमधाम प्राप्त होगा।

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