धर्म मार्गदर्शन

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16. गृहस्थ-जीवन

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ईश्वर न्यायकर्ता और नितिकर्ता है। वह परमदयालु परमात्मा है।

3. ईश्वर ने तुम्हारे लिए यह सृष्टि निर्माण की है।

4. तुम्हारा यह कर्तव्य है कि तुम ईश्वर का ध्यान करो और ईश्वर के बताये मार्ग पर चलो।

5. जीवन के चार मार्ग (आश्रम) बताये है, उनमे दूसरा मार्ग है गृहस्थ-जीवन।

6. गृहस्थ जीवन अर्थात वैवाहिक जीवन।

7. प्रत्येक मनुष्य को जीवनसाथी की आवश्यकता है। स्त्रीपुरुषों को एक-दूसरे के प्रति आकर्षण नैसर्गिक एवं प्रकृतिजन्य है। उनको एक-दूसरे से शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकता के परिपूर्ति की अपेक्षा रहती है।

8. इसमें स्वैराचार उत्पन्न न हो, समाज में अव्यवस्था, अनैतिकता न फैले, सामाजिक वातावरण दूषित न हो, इसलिए यह गृहस्थ-जीवन पद्धति का महत्त्व है।

9. व्यक्ति के मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ के लिए विवाह करना आवश्यक है।

10. कई युवा लोग इस संभ्रम में पड़ते है की विवाह करे या नहीं। विवाह करना यह आवश्यक तथा समाज स्वास्थ के लिए जरुरी है। अपने सभी देव-देवता, ऋषि-मुनि तथा महापुरुषों ने विवाह किये है, इसलिए अविवाहित रहने का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है।

11. जो लोग अविवाहित है वे अवश्य विवाह करें और किसी बेसहारा स्त्री को आधार दे। इससे बड़ी समाजसेवा नहीं है।

12. विवाह करने से स्त्री (पत्नी) और पुरुष (पति) को पूर्णत्व प्राप्त होता है। विवाह करना समाज-जीवन के लिए अच्छा है।

13. सभी युवक अपनी शिक्षा पूर्ण होने के बाद तथा नोकरी या अन्य व्यवसाय प्राप्त करने के बाद तुरंत विवाह करें।

14. विवाह करने में जादा देर भी न करें। उम्र बड़ी में विवाह करने से कई समस्याए भी उत्पन्न हो सकती है –जैसे संतान सशक्त न हों, संतान के युवा होने से पहले ही अपना बुढ़ापा आ जाना।

15. जिन्हें शारीरिक तथा मानसिक समस्या है वे विवाह न करे, क्योंकि इसका असर उनकी संतान पर हो सकता है।

16. विवाह करना एक सामाजिक जिम्मेवारी है। विवाह करने से रिश्ते बनते है। एक-दूसरे के परिवारों को जोड़ते है। संतान उत्पन्न करके समाज का विस्तार करते है। तुम्हारे बच्चों से ही रिश्ते बनते है, समाज बनता है।

17. धर्म वैवाहिक जीवन को केवल प्रणय नहीं मानता तो पतिपत्नी को अपनी सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के सहयोगी मानता है।

18. परिवार आनेवाली पीढ़ी का एक प्रशिक्षण केंद्र है। जैसा आपका आचरण है उसे देखकर ही आपके पुत्र, पुत्री सिखाते है।

19. इसलिए मातापिता अपना आचरण धर्म के अनुरूप रखे. निस्वार्थ भाव, दया, दान, सत्य का अनुसरण, स्वच्छता, व्यायाम, उत्तम भोजन और ईश्वर की भक्ति को आत्मसात करें।

20. शारीरिक तथा मानसिक दृष्टया सुदृढ़ परिवार ही अच्छे समाज को निर्माण करते है। वे समाज को अच्छे शिक्षक, सैनिक, शास्त्रज्ञ, व्यावसायिक, नेता ई। देते है।

21. प्रत्येक गृहस्थ समृद्धि को न्यायसंगत प्राप्त करने का प्रयास करें। सभी सुखसुविधा का यथोपरी आनंद प्राप्त करें।

22. पहली बार विवाह करना स्वाभाविक, आवश्यक और समाज स्वास्थ के लिए अच्छा है।

23. किन्तु पहली पत्नी के अभाव में दूसरी बार विवाह करना मज़बूरी या आवश्यकता हो सकती है, किन्तु यह समाजसेवा भी हो सकती है।

24. तीसरी बार विवाह करना अनावश्यक है।

25. राजा हो या सामान्यजन सबको विवाह कहना आवश्यक है। विवाह करने से मनुष्य को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक सुख प्राप्त होता है। सबसे महत्वपूर्ण है एक जीवनसाथी मिलता है।

26. सभी आश्रमों (जीवनपद्धति) में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है।

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