धर्म मार्गदर्शन

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15. ब्रह्मचर्य

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ईश्वर न्यायकर्ता और नितिकर्ता है। वह परमदयालु परमात्मा है।

3. ईश्वर ने तुम्हारे लिए यह सृष्टि निर्माण की है।

4. तुम्हारा यह कर्तव्य है कि तुम ईश्वर का ध्यान करो और ईश्वर के बताये मार्ग पर चलो।

5. जीवन के चार मार्ग (आश्रम) बताये है-ब्रहचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास। यह जीवन पद्धतिया है। तुमने कैसे जीवन जीना आवश्यक है इसका यह मार्गदर्शन है।

6. ब्रह्मचर्य अर्थात कामवासना का नियंत्रण और नियमन करते हुए विद्याग्रहण करना।

7. काम यह ईश्वर की देन है, किन्तु इसमें अतिरेक न हो इसलिए ब्रह्मचर्य यह ईश्वर ने बताया हुआ एक मार्ग है। जिसमे कहा गया है कि तुम काम के अधीन मत बनो।

8. जिसतरह योग है उसीतरह ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य का पालन करनेवालों को मन की शांति मिलती है तथा आरोग्य मिलता है। और दीर्घायुष्य प्राप्त होता है।

9. ब्रह्मचर्य जितना कठिन है उतना ही सरल है।

10. ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए स्त्री का दर्शन और चिंतन न करें। तुम स्त्री से बात कर सकते हो, उन्हें देख सकते हो, इसमें कोई बुराइ नहीं है। स्त्री के तरफ एक बार देखना स्वाभाविक है किन्तु बार बार देखना, घुरना यह ब्रह्मचर्य के विरुद्ध है। स्त्री के प्रति सन्मान यह ब्रह्मचर्य में आवश्यक है।

11. प्रत्येक व्यक्ति अपने युवावस्था में ब्रह्मचर्य का अनुकरण करें।

12. ब्रह्मचर्य यह नैसर्गिक नहीं है, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति के आदर्श जीवन की यह नीवं है।

13. ब्रह्मचर्य में कठोरता तथा जबरदस्ती नहीं, किन्तु इसे पालन करने का प्रयास करें। अर्थात अश्लीलता न करें।

14. ब्रह्मचर्य का दूसरा अर्थ विद्यार्थी जीवन में ज्ञान के साथ नैतिकता ग्रहण करना।

15. प्रत्येक युवक अपना सारा ध्यान विद्या प्राप्त करने में लगाये। प्रत्येक युवक-युवती जीवन के लिए उपयुक्त ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करे। वे कामवासना का चिंतन न करे। भविष्य में अपने व्यवसाय द्वारा समाज की सेवा करे।

16. प्रत्येक विद्यार्थी अपने शिक्षक का आदर करे। वह अपना जीवन सादगी से जिए। वह किसी भी बुरे शब्द तथा बुरे कर्म करके अपने शारीर तथा मस्तिष्क को ख़राब न करे।

17. वह अपने बड़े लोगों का आदर करे। अपने संस्कृति की रक्षा करे। वह अपने सामर्थ्य का संवर्धन करे।

18. सत्य को अपनाये, धर्म का अनुसरण करे तथ इस धर्म-मार्गदर्शन को ठहर ठहर के पढ़ें।

19. अपने व्यक्तिगत समृद्धि को दुर्लक्षित न करे, अपने अभ्यास को दुर्लक्षित न करे।

20. तुम अपने धर्म की निंदा न करो। अपने धर्म को आचरण में लाओ।

21. ईश्वर तथा मानवजाति के प्रति अपने कर्तव्य को नजर अंदाज न करो।

22. तुम अपनी माँ को देवता समझो और पिता को देव। उसी तरह उनसे आचरण करो। तुम्हारे मातापिता कैसे भी हो उनका अनादर न करो।

23. तुम शिक्षक को भी देवता की तरह समझो।

24. युवावस्था सबसे महत्वपूर्ण है इसलिए तुम्हारी संगती अच्छी हो। तुम किस तरह के लोगों के साथ रहते है इसपर तुम्हारी जीवनगति निर्धारित होती है। इसलिए अच्छे लोगों के साथ मित्रता करो। तुम जिस क्षेत्र में अपना करिअर बनाना चाहते हो, उस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के साथ मित्रता करो। तुम्हारी संगती ही तुम्हारे जीवन की दिशा तय करती है।

25. नियमों का पालन करो, जैसे-गलत कार्य करनेवाले के साथ न रहो, बुरे बोलनेवालों के साथ न रहो, अधर्म करनेवालों के साथ न रहो।

26. अपने आसपास के बुरे प्रवृति का असर तुम पर हो सकता है, उससे बचने के लिए तुम ईश्वर की उपासना करते रहो।

27. अगर तुम अच्छे कर्मयोगी हो, तो निश्चय ही इसका असर तुम्हारे आसपास के रहनेवालों पर होगा।

28. तुम दूसरों की देखादेखी न करो।

29. मनुष्य जीवन मिला है तो उसे हर तरह सार्थक बनाने का प्रयास करो।

30. अपनी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वैवाहिक जीवन में पदार्पण करो।

31. ब्रह्मचर्य के लिए अविवाहित रहने की आवश्यकता नहीं है। विवाहित भी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते है। उसके लिए विवाहित पुरुष एकपत्नीव्रत और विवाहित स्त्री एकपतिव्रता रहे।

32. तुम कामवासना का अतिरेक या प्रदर्शन न करो। समाज में नैतिकता बढाओ।

33. केवल अविवाहित रहना यह ब्रह्मचर्य नही तो नैतिक और चरित्रसंपन्न जीवन ही ब्रह्मचर्य है।

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