धर्म मार्गदर्शन

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12. काम

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. धर्म, अर्थ के बाद मनुष्य का लक्ष्य है ‘काम’।

3. इसमें इन्द्रियसुख अभिप्रेत है।

4. हिन्दुधर्म सबको सन्यासी, योगी बनाने का पक्षधर नहीं है। यह मानव जीवन में इन्द्रियसुख को समुचित महत्त्व देता है।

5. मनुष्य के मन और शरीर में उत्पन्न होनेवाली समस्त कामनाए और इच्छाए काम के अंतर्गत आती है।

6. इच्छा करना मनुष्य का नैसर्गिक स्वभाव है। यह इच्छा मरणोपरांत मनुष्य को चिपकी हुई रहती है। इच्छा से दुःख नहीं होता, इच्छा पूरी नहीं हुई तो दुःख होता है।

7. काम का अर्थ है वासना, तृष्णा। यह वासना खाने की हो, घूमने की हो या शरीर की हो, इसमें अनाचार न करें।

8. काम की प्राप्ति में धर्म (सदगुण, नैतिकता) को बनाये रखे।

9. काम का अर्थ है शारीरिक वासना, संभोग की आसक्ति। इस काम को कोई नष्ट नहीं कर सकता।

10. इसकी भी एक विधि है- सभी आसक्तियों को छोडना और योग का अभ्यास करना।

11. शास्त्रों में लिखा है- जहा राम (सदगुण, नैतिकता) है, वहाँ ही काम काबू में रहता है।

12. अत्यधिक कामवासना तथा अत्यधिक अनैतिकता मनुष्य को अल्पायुषी बनाती है। इसलिए इसमें सम्यक रहो।

13. जो सन्यासी है वे इसका चिंतन ना करे, बल्कि आसक्ति विरहित जीवन और योग की सहायता से इससे दूर रहे।

14. जो विवाहित है वे इसमें संतुलित तथा नियमित रहे। उनके लिए यह आवश्यक है, इससे उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति संतुलित रहेगी।

15. जादा काम के अधीन मत बनो, इससे अध:पतन होता है, अत्यांधिकता से शरीर की ओजशक्ति कम होती है। अत्यांधिकता से कई बिमारिया भी हो सकती है।

16. काम से दूर भागने की कोशिश भी मत करो। वह आपको कभी भी फसा सकता है। वह आपके शरीर, मन, इन्द्रियों के किसी भी कोने में छुप सकता है। इसलिए काम का तिरस्कार मत करो।

17. वह निरंतर है। कोई भी प्राणी इसे नष्ट नहीं कर सकता।

18. अगर आप काम पर काबू पाना चाहते हो तो, आप अपनी इच्छा तथा भावनाओं को सदगुण की तरफ मोड दो।

19. काम बुरा नहीं है, सब मनुष्य और प्राणियों की उत्पत्ति काम से ही हुई है। इसलिए काम को पुरुषार्थ माना गया है।

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