धर्म मार्गदर्शन

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11. अर्थ

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. धर्म के बाद मनुष्य का लक्ष्य है “अर्थ”।

3. भौतिक सुखसुविधाओं को प्राप्त करना अर्थ में समाविष्ट है।

4. मनुष्य का लक्ष्य समृद्धि, सम्पन्नता होना चाहिए, ऐसा यहाँ अभिप्रेत है।

5. अर्थ की प्राप्ति और उसका उपभोग धर्म अर्थात नैतिकता, न्यायसंगति एवं सदगुण पर आधारित है।

6. दरिद्रता अकर्मण्यता का लक्षण है। यह दरिद्रता सतत कर्मों से दूर की जा सकती है।

7. मनुष्य ही अपना भाग्य विधाता है। अगर वह सतत कर्म करता रहे तो वह अधोगति से उन्नति तक पहुचता ही है।

8. हिन्दुधर्म कर्मसिद्धांत पर विश्वास करता है।

9. इसलिए तुम कर्म करते रहो। कर्म से मुह मत फेरो।

10. तुम जितना कमाते हो उनमे से कम से कम पच्चीस प्रतिशत बचत करो।

11. अगर दरिद्रता से बचना चाहते हो तो बुरी आदतों से बचो।

12. जो लोग फिर भी बुरी आदते रखते है वे याद रखे कि अपने कमाई का एक प्रतिशत से जादा खर्च व्यसनों पर न करे, वर्ना दरिद्रता घेर लेगी।

13. जो लोग अपने कमाई का जादा हिस्सा गलत कामों में या देखादेखी में खर्च करते है उनके हिस्से में दरिद्रता और गरीबी आएगी।

14. जो लोग हाथ फैलाते रहते है, वे जिंदगी भर हाथ ही फैलाते रहते है। इसलिए तुम हाथ मत फैलाओ। दान देने की आदत रखो। भले ही एक रूपया दान करो, फिरभी दान करते रहो।

15. धर्म तथा धर्मकार्य करनेवाले सन्यासियों को दान दो, इससे तुम्हारे दोष दूर होंगे।

16. अपने भविष्य के लिए कुछ राशि जमा करके रखो, बुढ़ापे में कम आएगी।

17. अर्थ का सांसारिक जीवन में बड़ा महत्त्व है, इसके बिना व्यवहार नहीं हो सकता, इसलिए अर्थ की प्राप्ति करना बुरा नहीं है, किन्तु यह धर्मसंगत हो, इसमें अधर्म न हो।

18. बिना मुनाफे का व्यवसाय कोई नहीं करता। हर व्यवसाय में व्यक्ति मुनाफा कमाता है। अगर यह मुनाफा जादा हो या अवास्तविक हो, तो वह व्यक्ति बुरा कर रहा है।

19. पाप अर्थात बुराइ मत करो। पुण्यसंचय करो। अपने मुनाफे का कुछ हिस्सा दान करो। इससे सत्कर्म होगा, पुण्यसंचय होगा। मुनाफा कमानेवाले पुण्यसंचय करने के लिए हर संभव समाजसेवा करे।

20. शरीर के पालन पोषण के लिए धन की आवश्यकता होती है। धन प्राप्ति के लिए सतत कर्म करना आवश्यक है।

21. आपका सभी वैभव और धन यह ईश्वर का दिया हुआ है। इसलिए जिसके पास धन है वह त्याग भाव रखे।

22. इन्द्र हमेशा लक्ष्मी को प्राप्त करना चाहता है, किन्तु लक्ष्मी हमेशा विष्णु के पास ही जाती है। अगर तुम धन प्राप्त करना चाहते हो तो अपना चरित्र इन्द्र जैसा नहीं तो विष्णु जैसा बनाओ। इन्द्र का चरित्र कहता है सबकुछ मेरा है, मेरे लिए है। विष्णु का चरित्र कहता है में पालन करता हू, मुझपर जगत का दायित्व है।

23. पैसों के पीछे भागो मत। जितना तुम पैसों के पीछे भागोगे उतना पैसा दूर भागेगा। आपकी छाव की तरह।

24. अर्थ/पैसा/संपत्ति यह धर्मसंगत, न्यायसंगत और प्रमाणिकता से प्राप्त करो।

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