धर्म मार्गदर्शन

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10. धर्म

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. ईश्वर परमदयालु परमात्मा है। वह कृपा करनेवाला है।

3. यह पुस्तक आपके लिए धर्म का सही मार्गदर्शन है। यह आपके लिए सत्यमार्ग है।

4. इससे आप कही भटको मत। यह नि:संशय आपके लिए सत्यता का मार्ग है।

5. ईश्वर ने आपको चार पुरुषार्थ दिए है। पुरुषार्थ का अर्थ है जीवन के उद्देश।

6. वह चार पुरुषार्थ है –धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

7. प्रत्येक मनुष्य के जीवन के यह चार स्तंभ है, चाहे वह दुनिया के किसीभी कोने में रहता हो। इसके बिना कोई भी मनुष्य अपने जीवन को सफल नहीं बना सकता।

8. इसमें धर्म प्रथम है। धर्म सर्वाधिक विस्तृत और जीवन-पर्यंत मनुष्य को धारण किये रहता है।

9. धर्म का अर्थ है कर्तव्य।

10. जैसे पिताधर्म, पुत्रधर्म, पतिधर्म, पत्नीधर्म, राजधर्म, लोकधर्म ई। यहाँ धर्म का अर्थ है कर्तव्य।

11. धर्म का अर्थ है ‘यतो अभ्यदय: नि:श्रेय स: सिध्दी।’ अर्थात समाज की लौकिक (भौतिक) और पारलौकिक (आध्यात्मिक) उन्नति।

12. समाज की भौतिक उन्नति जैसे अन्न, वस्त्र, घर, वाहन ई.। समाज की आध्यात्मिक उन्नति अर्थात सभी प्राणिमात्र में ईश्वर की अनुभूति करना, सबसे प्रेम, सदभाव से रहना ई.।

13. धर्म का अर्थ है सत्य का अनुसरण।

14. धर्म का सम्बन्ध अध्यात्म से है, न की कर्मकांड से।

15. धर्म में न्याय, सदगुण, नैतिकता, न्यायसंगति, विधि और कर्तव्यपालन जैसी अवधारणाये समाहित है।

16. महाभारत में धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है- श्रद्धा, अध्ययन, सेवा, तपस्या, सत्य, करुणा, क्षमा, लालच से मुक्ति यह आठ गुण धर्म के है।

17. पहले चार गुण किसी भी व्यक्ति या सरफेरे में हो सकते है। किन्तु इसके साथ सत्य, करुणा, क्षमा, लालच से मुक्ति यह महात्मा के लक्षण है। जहा यह सारे गुण है, वह ही धर्म है।

18. धर्म का अर्थ है धारण करना।

19. परमात्मा की सृष्टि को धारण करने अर्थात बनाये रखने के लिए जो कर्म और कर्तव्य आवश्यक है वह ही मुलत: धर्म के लक्षण है।

20. विपत्ति में धीरज रखना, साधारण अपराध को क्षमा करना, भीतरी और बाहरी सफाई रखना, बुद्धि को उत्तम विचारों में लगाना, सम्यक ज्ञान का अर्जन, सत्य का पालन, मन को बुरे कामों से दूर रखना, चोरी न करना, इन्द्रिय लोलुपता से बचना, क्रोध न करना यह धर्म के आचरण के लिये आवश्यक कर्म है।

21. आचार ही प्रथम धर्म है। इसलिए अपना आचरण अच्छा रखो।

22. “अहिंसा ही परमोधर्म” है। मनुष्य कभी भी, कही भी, किसी भी मानव तथा प्राणी की हिंसा न करें।

23. जगत में अपने प्राण से प्रिय कोई भी वस्तु नहीं है। इसलिए मनुष्य अपने प्राण के साथ दूसरों पर भी दया करें।

24. धर्म उचित और अनुचित का भेद बताता है। उचित क्या है और अनुचित क्या है, यह देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करता है।

25. जीवनयापन के लिए अर्थ प्राप्त करना तथा कामनाओं की पूर्ति करना इसमें धर्मसम्मत मार्ग ही अपनाये।

26. यह शरीर नश्वर है। वैभव, धन टिकनेवाला नहीं है। एक दिन मृत्यु को आना है। सब लोगों को एक दिन मरना ही है। इसलिए धर्म का अनुसरण ही तुम्हारा परम कर्तव्य है।

27. धर्म का अनुसरण करने के लिए ईश्वर पर सात्विक-श्रद्धा रखो, ईश्वर के साकाररूप तथा निराकार ॐ की उपासना करो अर्थात ध्यान-उपासना करो।

28. ईश्वर सर्वज्ञ है। वह सबकुछ जाननेवाला है। वहाँ शिफारिश नहीं चलेगी। वहाँ तुम्हारे कर्म को देखा जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो।

29. जो अच्छे कर्म करते है वे ही अध्यात्म अर्थात धर्म में सफल होते है।

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