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8. जाति-व्यवस्था

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. दुनिया भर में लोग झुण्ड या ग्रुप बनाकर रहते है। इसी ग्रुप को कौम, कबीला, बिरादरी, जमात, कुल कहते है।

3. भारत में इसे जाति कहा जाता है।

4. भारत के बाहर भी जातिया थी। किंतू उन जातियों की संख्या कम है। इसका प्रमुख कारण है- भारत के बाहर जो हिंसा हुई उन में सैकडो जातियां तथा कौमें नष्ट हुई।

5. इतिहास की किताबों में लिखा है कि कई कौमें नष्ट की गई। कई कबीलों को नष्ट किया गया।

6. इतिहास की किताबों में लिखा है कि स्थानीय लोगों को मार कर वहाँ बस्तिया बसाईं गई, और अन्य समूह, कौम, कबीलों, जमातों की नष्ट किया गया।

7. किन्तु भारत में ‘अहिंसा परमोधर्म’ की वजह से जातियों को नष्ट नहीं किया गया।

8. जो व्यक्ति या जातिया स्थानिक नियमों का उल्लंघन करती थी उनका सामूहिक हत्याकांड नहीं हुआ, उन्हें नष्ट नहीं किया गया, बल्कि उनका बहिष्कार किया गया। अहिंसा ने उन्हें बचाया।

9. लेकिन विदेशों में सामूहिक हत्याकांड हुए और कई जातिया, कौमें नष्ट किये गए।

10. ताकतवर लोगों ने कमजोर तथा परास्त लोगों को अपने रितिरिवाज तथा श्रद्धा को अपनाने के लिये बाध्य किया गया, तथा जिन्होंने अपनाये नहीं उन्हें नष्ट किया गया, इसीकारण अन्यत्र जातिव्यवस्था नहीं दिखती।

11. लेकिन उनमे आज भी जाति की तरह कौमें, बिरादरिया, वंशवाद दिखाई देता है। इसके नाम पर खून-खराबा भी होता है।

12. भारत में अहिंसा, सहअस्तित्व तथा विभिन्नता को माना जाता है। इसी कारण आज भारत में कई जातिया अस्तित्व में है।

13. जाति इसलिए भी बनी है ताकि तुम एक दूसरे को पहचान सको, एक दूसरे के साथ रोटी और बेटी व्यवहार कर सको। जाति बनाने का मुख्य उद्देश समूह की सुरक्षा है।

14. यह जातिया ईश्वर ने नहीं बनायीं, बल्कि यह लोगों ने अपनी विरासत, संस्कृति विकसित करने के लिए, तथा सामाजिक सुरक्षा की दृष्टी से बनायीं है।

15. सब जाति का अपना अपना एक व्यवसाय था और वह व्यवसाय उसी जाति के लिए आरक्षित था। किन्तु व्यवस्था कितनी भी अच्छी हो वह पुरानी होने के बाद उसमे कोई ना कोई खराबी आती ही रहती है। उसी प्रकार इसमें भी कुप्रथाए बढ़ने लगी।

16. कोई भी एक प्रथा या कुप्रथा इस सम्पूर्ण समाज ने कभी भी स्वीकार नहीं की, उसे मान्यता नहीं दी।

17. सब की प्रथाए अलग अलग थी। सभी जातिया अपना कार्य करने में स्वतंत्र है।

18. सबको अपने अपने रीतिरिवाज मानने का स्वतंत्र है।

19. हर समाज में दस प्रतिशत लोग अच्छे, दस प्रतिशत लोग बुरे और बाकि लोग मध्यम होते है। दस प्रतिशत लोग बुरे होने से पूरा समाज बुरा नहीं होता।

20. कुछ लोग जातिव्यवस्था नष्ट करना चाहते है, किन्तु वे सफल नहीं हो सके। क्योंकि जातिया बुरी नहीं है, जातिभेद बुरा है।

21. जो लोग जातिव्यवस्था नष्ट करना चाहते है, वे भी अपनी अपनी जाति को चिपके हुए है। वे अपनी जाति को नष्ट नहीं करना चाहते। वे अपनी अपनी जाति का भला चाहते है। अपनी अपनी जाति से प्रेम करते है, अपनी अपनी जाति का विकास चाहते है।

22. यह जातिया नष्ट करने के लिए बड़े बड़े महापुरुषों में प्रयास किये है।

23. जातिया नष्ट होने के लिए जातियों का उल्लेख बंद होना चाहिए, उनकी चर्चा नहीं होनी चाहिए। किसीभी जाति का नाम नहीं लेना चाहिए, चाहे वह अपनी हो या दूसरे की। जाति को महत्त्व नहीं देना चाहिए। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। सभी नेताओ ने जाति का सहारा लिया। जिसका जादा उल्लेख होता है, चर्चा होती है वह नष्ट नहीं होती फैलती है।

24. कोई भी व्यक्ति, नेता ना सरकार किसी भी जाति का सौ प्रतिशत भला नहीं कर सकती, वे केवल प्रतिनिधिक रूप में किसी जाति का विकास कर सकते है। अर्थात केवल दस प्रतिशत लोगों का ही वे भला कर सकते है। बाकि नब्बे प्रतिशत लोगों को तो खुद ही अपनी उन्नति के लिए प्रयासरत होना पड़ेगा। ऐसे लोगो ने हमेशा याद रखना चाहिए कि वे खुद ही अपने जीवन के शिल्पकार है।

25. तुम ये बात ध्यान में रखो – तुम खुद ही तुम्हारे जीवन के शिल्पकार हो, खुद ही अपनी उन्नति के कारण बनो।

26. अपनी जाति पर निर्भर मत रहो, जाति का सहारा मत लो। जाति और समाज पर बोझ मत डालो, ना ही उनसे कुछ अपेक्षा रखो, उनसे कुछ लेने के बजाय तुम उनको क्या दे सकते हो यह सोचो।

27. जातिया बुरी नहीं है, सभी जातिया और लोकसमूह अच्छे है। बुरा है जातिभेद, उचनिचता, अन्धश्रद्धाये, कालबाह्यता।

28. आपस में भेदाभेद का मुख्य कारण है अज्ञानता, अहंकार और झूठा आवेश।

29. अहंकार को त्याग दो।

30. आपस में रोटी और बेटी व्यवहार करो।

31. जाति को नहीं, धर्म को महत्त्व दो। ईश्वर के शरण में आओं। सब मिलके ध्यान-उपासना करो।

32. धार्मिक संस्थाये समाज में समरसता कायम करने के लिए अन्नदान करे, धर्म का पैसा गरीबों के लिए खर्च करे, सबको धार्मिक सुविधाए निशुल्क दे।

33. धर्म में सबका एकत्रीकरण हो, समाज के सभी लोगों से संपर्क, संवाद हो, इससे समरसता बढ़ेगी।

34. कुछ समाज विघातक लोग कल भी थे, आज भी है और आगे भी रहेंगे। वे तुम्हे बदनाम करने के बजाय और कुछ नहीं कर सकते। उनपर जादा ध्यान मत दो, उनके लिए अधोगति के सिवा कुछ नहीं है।

35. तुम धर्म में दृढ़श्रद्धा रखो, धर्म का कार्य निरंतर करो, सबके साथ मिलजुलकर और प्रेम से रहो।

36. तुम्हारे विविधता में जो एकात्मता है वह निराकार ईश्वर की श्रद्धा है। इसलिए तुम निराकार ईश्वर की उपासना करो, ध्यान-उपासना करो और चिंता करना छोड दो। ईश्वर सर्वज्ञ है और सबको संभालनेवाला है।

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