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7. वर्ण-व्यवस्था

1. ॐ श्री परमात्मने नमः।

2. प्राचीन काल में चार वर्ण माने जाते थे। वे चार वर्ण है-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र।

3. ब्राह्मण अर्थात शिक्षक-बुद्धिजीवी।

4. क्षत्रिय अर्थात सैनिक-पुलिस।

5. वैश्य अर्थात व्यापारी-व्यावसायिक।

6. शुद्र अर्थात मजदुर-कर्मचारी।

7. यह चार वर्ग- शिक्षक-बुद्धिजीवी, सैनिक-पुलिस, व्यापारी-व्यावसायिक, मजदुर-कर्मचारी दुनिया के हर देश में थे और आज भी है। यह वर्ग कर्म पर आधारित है।

8. प्राचीन भारत में राजाओं ने अपने राज्य की सुलभता के लिए इन चार वर्णों का निर्माण किया था।

9. मनुस्मृति के पहले भी कई स्मुतियों ने इन चार वर्गों को विकसित किया था।

10. जो राजा इन चार वर्गों को दुर्लक्षित करता है, उसके राज्य में अराजकता फैलती है, उसका अध:पतन होता है।

11. शिक्षक-बुद्धिजीवी दुर्लक्षित होने से समाज में बौद्धिक दारिद्र्य फैलता है।

12. सैनिक-पुलिस दुर्लक्षित होने से बाहरी आक्रमण का खतरा तथा आतंरिक अराजकता का खतरा उत्पन्न होता है।

13. व्यापारी-व्यावसायिक दुर्लक्षित होने से समाज की संपन्नता नष्ट होती है।

14. मजदुर-कर्मचारी दुर्लक्षित होने से भूख, बेरोजगारी बढती है।

15. राजाओं के लिए यह निर्देश था कि वे इन चार वर्णों के हितों की रक्षा करें तथा संवर्धन करे।

16. किन्तु राजाओं ने इसे जाती आधारित बना दिया और सभी जातियों को इन चार वर्णों में विभाजित किया। वे अपनी जिम्मेवारी से हट गए। वे केवल कर वसूलते थे और राज करते थे।

17. राजा ने ब्राह्मणों को दुर्लक्षित किया, तो उन पर उपजीविका का संकट आया, इसलिए उन्होंने शिक्षण देने का कार्य छोडकर कर्मकांड को उपजीविका का साधन बनाया, इससे धर्म पर ग्लानी आ गयी।

18. राजाओं ने क्षत्रियों को दुर्लक्षित किया। क्षत्रिय वर्ग कमजोर हुआ, राजाओं की हार हुई, देश गुलामी में गया।

19. राजाओं ने वैश्यों को दुर्लक्षित किया तो व्यापार-व्यवसाय ध्वस्त हुए।

20. राजाओं ने शूद्रों को दुर्लक्षित किया, तो भूख, गरीबी, बेरोजगारी बढ़कर अराजकता फ़ैल गई।

21. आज यह जाती आधारित वर्णव्यवस्था नष्ट हो चुकी है। किन्तु कर्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था आज भी दुनिया के सभी देशों में चल रही है। इसके बिना राज्य का कार्य चल नहीं सकता।

22. प्रत्येक सरकार को इनकी आवश्यकता है। यह निरंतर है।

23. शिक्षक-बुद्धिजीवी, सैनिक-पुलिस, व्यापारी-व्यावसायिक, मजदुर-कर्मचारी- हर युग, हर समय में इन चार वर्गों की प्रत्येक देश को आवश्यकता है।

24. यह चार वर्ग दुनिया के सभी देशों की सरकारों के चार स्तंभ है। यह वास्तविकता है।

25. यह धर्म व्यवस्था नहीं है। यह एक ऐहिक व्यवस्था है।

26. तुम इसका आग्रह मत रखो।

27. यह वर्ग व्यवस्था राजाओं की व्यवस्था थी। यह धर्म का कार्य नहीं है।

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