धर्म मार्गदर्शन

46. मन

46. मन

  1. ॐ श्री परमात्मने नमः
  2. मन शरीर में कहा है यह कोई नहीं जानता, क्योंकि उसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं है.
  3. मन वास्तव में आत्मा से प्रकट हुई एक आभा है जो शरीर को अंतरबाह्य व्याप्त है.
  4. मन प्रकाश की तरह गतिशील है, हवा की तरह अदृश्य है.
  5. जैसा मन कहता है, वैसा शरीर कार्य करता है. मन जैसा सोचता है, वैसा ही मनुष्य बनता है.
  6. मन ही मनुष्य को संचालित करता है.
  7. संत तुकाराम कहते थे, “मन को प्रसन्न रखो, सभी सिद्धियों का वह मूल है.”
  8. जो व्यक्ति मन में हमेशा भूतकाल के बारे में सोचकर दुखी होता है, उसे निराशा आती है. जो व्यक्ति भविष्य के बारे में सोचकर चिंता करता है वह अस्वस्थ होता है. जो व्यक्ति साक्षीभाव से वर्तमान को जीता है, वह सही मायने में सुख अनुभव करता है.
  9. मन को नजर अंदाज मत करो. जैसा मन में रखोगे वैसा उसका फल है.
  10. मन में सदैव अच्छे विचारों से भरो, सकारात्मक सोचो तभी बुरे विचार, नकारात्मकता नष्ट होंगे, जैसे दीपक प्रज्वलित करने से अन्धकार नष्ट होता है.
  11. मन और मस्तिष्क एक दुसरे से जुड़े हुए है. मन मनुष्य का Ram है और मस्तिष्क memory है. दोनों की क्षमता अनंत है. जो जितना उसका उपयोग करेगा उतनी उसकी क्षमता बढती है.
  12. मन में सदैव निराशा रखने से मनुष्य का शरीर नष्ट हो सकता है या मनुष्य स्वयं को नष्ट कर सकता है. इसलिए मन में कभी भी निराशा को स्थान न दे. निराशा अगर मन में आयी तो उसे भगाने के लिए तुरंत मन को प्रसन्न करनेवाली छोटी छोटी चीजे करें.
  13. बड़ी ख़ुशी के पीछे मत पड़ो, छोटी छोटी खुशिया बटोरो. जैसे बूंद बूंद से तालाब बनता है, वैसे ही छोटी छोटी खुशियों से सम्पूर्ण जीवन खुशियों से भर जाता है.
  14. मन अगर किसी एक कल्पना के बारे में सतत सोचता है तो मस्तिष्क भी उसे उसी विषय में नए नए अविष्कार करने के लिए सहयोग करता है, नयी नयी कल्पनाये देता रहता है. तभी लोग नये नये अविष्कार करने में सफल हुए है. इसलिए स्वामी विवेकानंद कहते थे-मन में जो रखोगे, वैसा बनोगे.
  15. एक कहावत है, मन हारा तो सब कुछ हारा. इसलिए सदैव मन को सामर्थ्यवान रखो.
  16. मन को सामर्थ्य देने के लिए “ॐ सामर्थ्यदाताय नमः” का जाप करो. यह मन्त्र मदतगार है.
  17. मन के दो आवरण है- बाह्य-मन और अंतर्मन. बाह्यमन में जो विचार सदैव रखे जाते है वे अंतर्मन में प्रवेश पाते है. जैसे विचार अंतर्मन में सदैव होते है, उसी तरह मनुष्य का व्यक्तित्व बनता है, उसके जीवन की दिशा तय होती है, उसका स्वभाव बनता है.
  18. प्रत्येक व्यक्ति समष्टि से जुड़ा हुआ है अर्थात प्रत्येक आत्मा परमात्मा से जुड़ा हुआ है. अंतर्मन आत्मा से जुड़ा हुआ है. अंतर्मन से की हुई प्रार्थना परमात्मा तक पहुचती है. जो प्रार्थना परमात्मा तक पहुचती है, तभी वह सफल होती है.
  19. एक कहानी है जिसमे एक व्यक्ति को एक भूत मिलता है. वह भूत उसे कहता है- “तुम मुझे कोई भी काम दो, मैं उसे करूँगा. अगर मुझे काम नहीं दिया तो मैं तुझे ख़त्म करूँगा.” वह व्यक्ति भूत को काम देता है भूत उसे तुरंत करता है. वह व्यक्ति भूत से सभी काम करवाता है. भूत भी उसके सभी काम तुरंत कर देता है. जब व्यक्ति के पास कुछ भी काम बचता नहीं. तो वह सोचता है की भूत को काम नहीं दिया तो वह उसे मारेगा. तो वह भूत को एक खंबे पर चढने-उतरने का काम देता है. और कहता है जब तक आवाज न दू तब तक चढते-उतरते रहना. भूत खम्बे पर चढ़ता है, उतरता है. इसतरह व्यक्ति की जान बचती है.
  20. इस कथा में भूत अर्थात मन है. अगर मन को काम नहीं दिया तो वह मनुष्य को खा जाता है. खम्बे पर चढ़ना और उतरना मतलब सास अंदर लेना और बाहर छोड़ने के साथ नामस्मरण करना है.
  21. मन को कभी भी खाली मत छोड़ो उसे ईश्वर के नामस्मरण में लगाओ. मन को शांत रखने के लिए “ॐ शांति” मन्त्र मदतगार है.

वाचकों की संख्या

  • 8,783